शनिवार, 7 मई 2011

नकली नोटों का मायावी जंजाल


खबर है कि भारतीय रिजर्व बैंक के भोपाल स्थित क्षेत्रीय मुख्यालय ने तकरीबन तीन लाख के दो हजार नकली नोट पुलिस को सौंपे हैं। आरबीआई को यह जाली करेंसी पांच माह के अंदर राजधानी समेत राज्य के विभिन्न बैंकों से मिली है। आरबीआई की इस औपचारिकता को पुलिस ने दर्ज कर लिया है। कुछ दिनों बाद पुलिस खात्मा लगा कर फाइल बंद कर देगी। जाली करेंसी जैसे अत्यंत संवेदनशील मामले में भारतीय रिजर्व बैंक और पुलिस के बीच सालाना होने वाली यह सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े इस मसले का दूसरा पहलू बेहद खतरनाक और शर्मनाक है। यदि हम नायक कमेटी की रिपोर्ट पर गौर करें तो मौजूदा समय में 169 हजार करोड़ रुपए मूल्य के नकली नोट भारतीय बाजार में प्रचलन में हैं। एक आधिकारिक अनुमान के अनुसार हर एक हजार में से दस नोट जाली हैं। भारतीय रिजर्व बैंक से लेकर राष्ट्रीय और प्राइवेट सेक्टर तक के बैंकों के कोष नकली नोटों से मालामाल हैं।
एटीएम जाली करेंसी उगल रहे हैं। असली-नकली नोट बताने वाली मशीनें भी नकली को असली बता रही हैं। आम आदमी की तो छोड़िए, विशेषज्ञों के लिए भी यह तय कर पाना असंभव हो रहा है कि उनके हाथ में जो नोट है, वह असली है या फिर जाली। डायरेक्टर ऑफ रेवन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, सीबीआई, वित्त मंत्रलय और सेंट्रल इकोनॉमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो भी लाचार हैं। देश की शीर्ष खुफिया जांच एजेंसियां अब यह धारणा बनाकर घर बैठ चुकी हैं कि नकली नोटों की खेप सरहद पार से आती है और नेपाल का काठमांडू तथा बांग्लादेश का ढाका इसके ट्रांजिट पाइंट हैं। यह भी सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को असंतुलित करने के लिए नकली नोटों की सप्लाई के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है, लेकिन सिर्फ इतना ही सोच कर बैठ जाने से बात बनने वाली नहीं है। हमें इससे भी आगे उन यूरोपीय आधारों पर भी गौर करना होगा, जो जाली करेंसी छापने के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं।
यहां गौरतलब तथ्य यह भी है कि चाहे हमारी शीर्ष जांच एजेंसियां हों या पुलिस और या फिर बैंक नकली नोटों की बरामदगी के मामले में किसी की भी भूमिका व्यावहारिक नहीं है। सबके सब गैरजिम्मेदार हैं। मसलन-सौ का नकली नोट यदि किसी भी आम आदमी के हाथ लगता है, तो वह इस भय के कारण हाय-तौबा नहीं मचाता कि कहीं वह फंस न जाए। नकली नोट जिसके हाथ में मिला वही अपराधी है, जैसी धारणा के कारण प्राय: जाली करेंसी गलाने वाले लोग बच जाते हैं। नकली नोट चाहे बैंक से कैश में मिले या एटीएम उगले। हर कोई इसकी जिम्मेदारी लेने से बचता है। देश में नकली नोटों का मायावी जंजाल इस कदर हावी है कि लोग पांच सौ और हजार के नोट के लेन-देन के वक्त इस बात को लेकर भयभीत रहते हैं कि कहीं, उनका नोट नकली न निकल जाए। सच तो यह है कि जब तक हमारी जांच एजेंसियां जाली करेंसी के असली यूरोपीय आधारों तक नहीं पहुंचती हैं, तब तक हमें इस भारी संकट से निजात मिलने वाली नहीं है।

नीति से ज्यादा नीयत का सवाल


लोकतंत्र में विशेषाधिकारों से विभूषित हमारे सियासतदार अगर लोकपाल जैसी किसी स्वायत्त शक्ति की कल्पना मात्र से भयभीत हैं ,तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। ऐसी किसी भी शक्ति का सामना करने के लिए नैतिक बल की जरूरत होती है। नैतिकता हाट-बाजार में नहीं बिकती। यह अमूल्य आत्मबल है। नैतिकता के पतन में हमारा कोई सानी नहीं है। दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र में लोकपाल विधेयक पिछले 45 वर्षो से लंबित है। वर्ष 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने लोकपाल कानून बनाए जाने की सिफारिश की थी। इस बीच यह विधेयक मंजूरी के लिए 8 बार लोकसभा में आया लेकिन स्वीकृति नहीं मिली। अंतत: अब यूपीए की मनमोहन सरकार लोकपाल विधेयक का जो प्रारूप लेकर आई है, वह राज्यों में लोकायुक्तों जैसा है। देश के कमोवेश सभी राज्यों में लोकायुक्तों की हैसियत किसी से छिपी नहीं है। लोकायुक्त संगठन को सियासी मामलों में अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता है। संगठन सिर्फ सरकार से सिफारिश कर सकता है। इसे सजा देने तक का अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर लोकायुक्त साधारण संस्था बन कर रह गई है। जांच के लिए वह सरकार पर निर्भर है। आमतौर पर सत्ता तंत्र लोकायुक्त का राजनैतिक इस्तेमाल करता है।
लोकपाल के सवाल पर केंद्र सरकार की नीयत लगभग ऐसी ही है। लोकपाल के लिए तैयार किया खाका भी तकरीबन लोकायुक्त की तरह उसे बेजान बनाए रखने का दस्तावेज है। इस मसले पर सरकारी नीयत कितनी साफ है, अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि विधेयक के लिए गठित मंत्रिमंडलीय समिति के अध्यक्ष कोई और नहीं बल्कि शरद पवार हैं। भ्रष्ट शिष्ट शरद पवार दूध के कितने धुले हैं? यह सारा देश जानता है। यही वजह है कि सरकारी मंशा के खिलाफ प्रख्यात समाजसेवी और छोटे गांधी अन्ना हजारे जंतर-मंतर से सारे देश में अपने विरोध के स्वर मुखर कर जन जागृति का मंत्र फूंक रहे हैं। उनकी एक आवाज का आगाज यह है कि पांच राज्यों के दो सौ शहरों में लाखों लोग इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले आंदोलित हैं।
लोकपाल की स्वायत्त शक्ति के सवाल पर सारा देश एक ऐसा प्रारूप चाहता है जो संयुक्त समिति की सहमति से बने। ऐसी समिति जिसमें कम से कम पचास फीसदी सदस्य अराजनैतिक मगर विशिष्ट सामाजिक लोग हों। वैधानिक पृष्ठभूमि पर लोकपाल यानि जन लोकपाल की हैसियत सुप्रीमकोर्ट,भारत निर्वाचन आयोग और सीएजी जैसी हो। प्रधानमंत्री भी जन लोकपाल की जांच के दायरे में हों । सीबीआई और सीवीसी जैसी सरकारी जांच एजेंसियां देशमें जन लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त के अधीन हों। सवाल यह है कि जिस देश में राजनैतिक दल अपने लिए पूर्ण बहुमत जुटाने की सामथ्र्य नहीं रखते हों? जिस देश के नागरिक जीवन की नस-नस में भ्रष्टाचार के शिष्टाचार का लहू दौड़ रहा हो ,उस देश के सियासी दल क्या जन लोकपाल जैसी स्वायत्त शक्ति के लिए नैतिकसाहस जुटा पाएंगे? वस्तुत: यह मामला नीति से ज्यादा नीयत का है।

कानून और विकिलीक्स


सनसनी खेज खुलासों के लिए मशहूर विकिलीक्स भारतीय कानून के सामने आखिर किस हद तक टिक सकता है? अदालती फैसलों की बुनियाद वस्तुत: साक्ष्यों पर टिकी होती है । क्या विकिलीक्स के साक्ष्य वैधानिक स्तर पर स्वयं के सत्यापन की दम रखते हैं? विधि विशेषज्ञों के बीच ऐसे सवालों पर मंथन स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि अगर विकिलीक्स के आरोपों का कानून की नजर में वाकई कोई मूल्य नहीं है, तो भारतीय मीडिया को सिर्फ सनसनी बेचने से बाज आना चाहिए। मीडिया को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए पहले यह तय करना चाहिए कि क्या विकिलीक्स के दस्तावेज कानूनी की कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? या फिर ऐसे खुलासे महज सियासी मसला हैं। यदि ऐसा ही है, तो इससे देश का भला नहीं है। देश में आम सरोकार से जुड़े अहम मसलों का अकाल नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विकिलीक्स के खुलासे कुछ और नहीं सिर्फ ओरिजनल केबलों की कॉपी हैं,विधि विशेषज्ञों की राय में कोर्ट में कोई भी दस्तावेज तब तक कार्यवाही योग्य नहीं होता है,जब तक उसका सत्यापन संभव नहीं हो। बहुचर्चित बोफोर्स कांड का अंजाम हमारे सामने है।
फिहहाल यह कहना मुमकिन नहीं कि उसके खुलासे बेदम और दस्तावेज झूठ का पुलिंदा ही हैं, लेकिन आरोपों का वैधानिक सत्यापन जरा संदिग्ध लगता है। ऐसे में अफवाहों के साथ सच्चइयों का बाजार तो गर्मा सकता है, लेकिन नतीजा शिफर ही रहेगा। अमेरिका समेत समूची दुनिया की शीर्ष सत्ता के लिए सिरदर्द बन चुके विकिलीक्स के संस्थापक जुलियन असांजे आज विश्व मीडिया के सिर माथे पर हैं। बेशक उनके साहस को दाद मिलनी चाहिए, लेकिन उनकी इस साहसिक मुहिम की अतिरंजना और अंधानुकरण से पहले हमें हमारी जिम्मेदारियों को भी पूरी शिद्दत के साथ समझना चाहिए। मीडिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि विकिलीक्स ने ढाईलाख से भी ज्यादा जो गोपनीय दस्तावेज न्यूर्याक टाइम्स को सौंपे हैं ,उनमें से तीन हजार से भी ज्यादा नईदिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से संबंधित हैं।
ऐसे मे मीडिया को इन दस्तावेजों के सत्यापन से पहले ही सार्वजनिक मान्यता देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। देश की एकता,अखंडता और संप्रभुता के सवाल पर विचार करते हुए उसे अपने मूल दायित्वों को समझना ही होगा। दुनिया जानती है कि विकिलीक्स के संस्थापक जुलियन असांजे साफ्टवेयर प्रोटेक्शन सिस्टम को समझने और तोड़ने में माहिर हैं और आज वह मीडिया की बदौलत ही एक एक्टिविस्ट कंप्यूटर हैकर के रूप में खुद को स्थापित करने में कामयाब रहे हैं, लेकिन भारतीय कानून के तहत किसी पर इल्जाम लगाने के लिए सिर्फ इतनी पात्रता पर्याप्त नहीं है। अदालत को सत्यापित साक्ष्य चाहिए । एक अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण के दौरान नासा का कंप्यूटर हैक कर सनसनी फैला चुका यह शख्स भारतीय कानून के सामने आखिर किस हद तक टिक सकता है? अंतत: इस सवाल पर विचार होना ही चाहिए।

जय हो, विश्व विजय हो..


नभ में तिरंगा फहरा दो, सचिन बाबू थोड़ा से जोर लगा दो..अपने ही घर-आंगन की दहलीज पर महाशतक से सिर्फ एक कदम दूर खड़े क्रिके ट के भगवान सचिन तेंदुलकर की आज सचमुच अग्निपरीक्षा है। मुंबई के इस महासंग्राम में मास्टर ब्लास्टर अकेले नहीं हैं। विश्वकप की सौगात के लिए सवा अरब हाथ उनके साथ हैं। क्या नेता, क्या अभिनेता? पूजा-अर्चना, हवन और यज्ञ। हर हाल में लंकादहन के लिए एक ओर प्रयाग के पवित्र संगम में बजरंग महारूद्र यज्ञ तो दूसरी ओर साबरमती जेल में मुस्लिम कैदियों की दुआएं। मानो विविधता से भरे हिंदुस्तान की सिर्फ एक ही महत्वाकांक्षा है ..विश्वकप हमारा हो।
भारत-श्रीलंका के शासनाध्यक्षों, सात राज्यों के सीएम, 37 केंद्रीय मंत्रियों के अलावा लाखों लाख क्रिकेटप्रेमियों के साथ आज ये धरती, ये आसमान, ये हवाएं और ये फिजाएं, सब साक्षी होंगे, एक इतिहास के और इतिहास रचेंगे जीतने की जिद, जोश और जुनून से लबरेज धोनी के धुरंधर। जज्बा उफान पर है। बेशक यह वक्त टीम इंडिया की क्षमताओं पर सवाल खड़े करने का नहीं है। मोहाली के हाईवोल्टेज सेमीफाइनल में पाक को पीट चुके माही के जांबाजों से अब सिर्फ लंका पर विजय की उम्मीद है। उम्मीदों की इस कसौटी पर खरा उतरने को खड़ी टीम इंडिया से सामने भी अब महज एक ही विकल्प है, विश्वकप..।
क्रिके ट प्रेमियों को सबसे ज्यादा अगर किसी पर भरोसा है तो वह हैं सचिन तेंदुलकर। अपने 22 साल के क्रिकेट कॅरिअर में अब तक 6 विश्वकप खेल चुके क्रिकेट के इस करिश्माई बल्लेबाज के सामने एक और इतिहास लिखने का यह ऐतिहासिक अवसर है। संभवत: यह उनका आखिरी वर्ल्डकप है। वह सौवें शतक की क्रीज पर खड़े हैं। पूरे 28 साल बाद यह ऐसा मौका है जब हम विश्व क्रिकेट में स्वयं क ो शहंशाह साबित करने के एकदम करीब हैं। यह मुंबई का वही वानखेड़े स्टेडियम है, जहां अब से 21 साल पहले क्रिकेट के इस भगवान ने बतौर बाल ब्याय विश्वकप का जो सपना देखा था, उसी सपने को साकार करने का दिन है।
वानखेड़े के पिच क्यूरेटर को सचिन से तीस मिनट में सौवें शतक की उम्मीद है। सचिन के लिए कुछ भी संभव है। वनडे में दोहरा शतक जड़ चुके सचिन यूं ही क्रि केट के भगवान नहीं हैं। लेकिन क्रिकेट भी आखिर अनिश्चितताओं का ही रोमांच है। इस खेल में यूं तो कुछ भी संभव है, मगर तथ्य यह है कि लंकाई चीतों के मुकाबले भारत के शेर किसी भी हालत में कम नहीं हैं। यहां संयम और समझदारी की दरकार है। टीम इंडिया की बैटिंग बेमिसाल है और सबसे बड़ी बात हौसले बुलंद हैं। मुकाबले में प्रतिस्पर्धी को कभी भी कम करके नहीं आंकना चाहिए। कम से कम श्रीलंका के सवाल पर टीम इंडिया किसी भी जोखिमपूर्ण भ्रम में नहीं है। उम्मीदों भरी कठिन परीक्षा का एक यर्थाथ पहलू यह भी है कि खेल के सिर्फ दो सच होते हैं। जीत या हार। ऐसे में हमें देश से यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि हम खेल को खेल की भावना से ही लें।

बेटियां मांगें जीवन दान


भारत की 15वीं जनगणना के उत्साहजनक आंकड़ें हमारे सामने हैं। बेशक हम जनसंख्या विस्फोट के प्रति अपेक्षाकृत संजीदा हुए हैं। महिलाओं क ी साक्षरता में भी अप्रत्याशित सुधार आया है। मगर सवाल यह है कि हम अपनी मासूम बेटियों के प्रति आखिर कब संवेदनशील होंगे? हम और हमारी सरकारों के लिए इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली कोई और बात क्या होगी कि जनगणना के ताजा आंकड़े गर्भ में ही कन्या कत्ल की गवाही देते हैं। यह अकेले हमारी सरकारी नीतियों की विफलता का नतीजा नहीं है। यह सत्य हमारी, आपकी और हम सब की नीयत से जुड़े नैतिक मूल्यों के क्रियाकर्म का भी दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम है।
मध्यप्रदेश में एक दशक के दौरान जहां प्रति हजार पुरुषों के बीच 11 महिलाएं बढ़ी हैं, वहीं इसी बीच प्रति हजार बालकों के बीच 20 बालिकाएं घटी हैं। यह खतरे की घंटी है। अगर यही आलम रहा तो छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब की तरह मध्यप्रदेश को भी इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। सच तो यह है कि 6 साल से कम उम्र के बच्चों के बीच तेजी के साथ बिगड़ता लैंगिक संतुलन देशव्यापी चुनौती है। आजादी के बाद ऐसा पहली बार है जब बीते एक दशक के दौरान बच्चों का लिंगानुपात बड़ी तेजी के साथ घटा है। देश में वर्ष 1961 में प्रति हजार बालकों के बीच जहां 976 बालिकाएं दर्ज की गई थीं, वहीं आज प्रति हजार बालकों पर बालिकाओं की तादाद घटकर 914 रह गई है।
जनगणना के ताजा आंकड़ों के संदर्भ में हम अपने परिवार कल्याण कार्यक्र मों की सफलता के लिए खुद की पीठ भले ही ठोंक लें, लेकिन कोख में ही कन्या भ्रूण की हत्या का भूत हमारी नैतिकता को झकझोरता जरूर है। मर्म तक मार करते इस मसले पर अब अविलंब एक राष्ट्रव्यापी अभियान के जरिए ईमानदार कोशिश की जरूरत है। यह किसी एक का दायित्व नहीं है। इस आंदोलन के लिए जनजागृति और जन भागीदारी की दरकार है। हमें बेटियों को बचाना ही होगा। कहना न होगा कि आज के खुदगर्ज जमाने में अगर बेटियां जीवंत हैं, तो इसका श्रेय उनकी जिजीविषा और जीवन शक्ति को जाता है।
मध्यप्रदेश के लिए खासकर यह सुखद है कि पिछले एक दशक के दौरान जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में 3.96फीसदी गिरावट आई है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आबादी के लिहाज से ब्रिटेन जैसे देश से भी हमारा प्रदेश आगे है। कमोवेश यही हाल छत्तीसगढ़ का भी है। छग प्रदेश की आबादी आस्ट्रेलिया जैसे देश से भी अधिक है। अगर वाकई हमें हमारी बेलगाम होती आबादी पर लगाम लगानी है, तो जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार पर कम से कम से 10 प्रतिशत की गति से गिरावट लानी होगी। साक्षरता के सवाल पर शानदार प्रदर्शन के बाद भी मध्यप्रदेश के लिए आदिवासी बहुल्य अलीराजपुर और छत्तीसगढ़ का बीजापुर जिला अपने-अपने राज्यों के निरक्षर साबित हुए हैं। निरक्षरता के इस कलंक को मिटाने का भी संकल्प लेना चाहिए।

अमेरिकी थाने में भारत की फरियाद


पाकिस्तान की पनाह में आतंक के आका ओसामा की मौत के बाद अब शक नहीं कि देश की एकता,अखंडता और संम्प्रभुता के दुश्मन हमारा चैन चुरा कर कहीं और नहीं बल्कि पड़ोसी के घर पर ही चैन की बंसी बजा रहे हैं । कहने को तो देश के दुश्मन नंबर वन लश्कर-ए-तैयबा के प्रति भारत का रुख कंट्रोल,ऑल्ट और डिलीट से ज्यादा नहीं है पर असल में हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम और विदेश मंत्री एमएस कृष्णा के इरादे लकीर के फकीर ही हैं। भारत अभी भी चाहता है कि या तो पाकिस्तान स्वयं 26/11 के गुनहगारों को हमारे सुपुर्द कर दे या फिर अमेरिका ओसामा के खिलाफ चलाए गए अपने आतंकवाद विरोधी अभियान को जारी रखते हुए ठीक उसी तरह ढेर कर दे, जैसे ओसामा को मारा गया।
भारत ने एक ओर जहां साफ कर दिया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका जैसी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है वहीं उसका मानना है कि ओसामा के खिलाफ इस आपरेशन से पाकिस्तान की संम्प्रभुता का अतिक्रमण नहीं हुआ है। भारत का यह भी मानना है कि पाक के साथ हमेशा युद्ध की बातें करना तो आसान है, लेकिन पड़ोसी होने के नाते सीधे सैन्य कार्यवाही आखिरी रास्ता नहीं है। भारत की नजर में सिर्फ बातचीत ही एक मात्र विकल्प है पर सवाल यह है कि दशकों से हम समझाइश के जिस अंतहीन रास्ते पर चल रहे हैं, उससे यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हम कभी अपने दुश्मनों के खिलाफ अंजाम तक पहुंच पाएंगे? दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में मस्ती काट रहे भारत के दुश्मनों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट का गुनहगार और 26/11 के हमलों का मददगार दाऊद इब्राहिम करांची के क्लिफ्टन इलाके में ठाठ से रहता है, लेकिन 25 साल बाद भी हम उस पर खरोंच तक नहीं मार पाए हैं। उसके अल-कायदा से रिश्ते हैं और वो लश्कर ए तैयबा के हाथों का खिलौना है। यह अकेला गुनहगार नहीं है। मुंबई हमलों का मास्टर माइंड हाफिज सईद हो या इन्हीं हमलों का दूसरा मास्टर माइंड लखवी कांधार कांड का सूत्रधार मसूद अजहर ,लश्कर-ए-तैयबा का सबसे खतरनाक आका यूसुफ मुजम्मिल या फिर साजिद मीर। सबके सब पाकिस्तान में ही बैठकर भारत विरोधी हिंसक अभियान चलाते हैं।
आशय यह कि हमें मालूम है कि हमारे हमलावर कौन हैं? और कहां उनके ठिकाने हैं? लेकिन विडंबना यह है कि बावजूद इसके आतंक के खिलाफ लड़ाई के लिए आज भी हम दूसरों की मदद के मोहताज हैं। कभी हम पाक से अपने दुश्मनों का समर्पण कराने की गुजारिश करते हैं तो कभी हम अमेरिका से आतंक के खिलाफ जंग जारी रखने की उम्मीद। यह भी साफ है कि अमेरिका हमारी मदद के लिए आने वाला नहीं है। क्या,हमें अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़नी चाहिए?आतंक के खिलाफ आक्रामक रणनीति नहीं अपनाने की हमारी आखिर लाचारी क्या है? आतंक के खिलाफ अमन की हमारी अब तक की कोशिशों के निराशाजनक नतीजे ही हाथ लगे हैं। वक्त का तकाजा तो यही है कि सरहद पार बैठी देश तोड़क ताकतों की कमर तोड़ने के लिए भारत को भी आक्रामक रणनीति अख्तियार कर लेनी चाहिए।

कागजी करारों का अंजाम


्रमध्यप्रदेश में औद्योगिक निवेश की नाकामी के मसले पर कौन किससे परेशान है? सरकार,निवेशकों से या निवेशक सरकार से? राज्य में औद्योगिक विकास की संभावनाओं के साथ शुरू किए गए निवेश के इस अभियान की आज हालत खराब है। तीन साल के दौरान साइन किए गए 16 हजार क रोड़ के 443 एमओयू में से महज 6 प्रतिशत ही मूर्तरूप में हैं। 111 एमओयू सरकार पहले ही निरस्त कर चुकी है। अब नए एमओयू नहीं साइन किए जाने के साथ ,चेतावनी दी गई है कि करार पर काम नहीं हुआ तो शेष एमओयू भी खारिज कर दिए जाएंगे। सरकार के इस फैसले से उद्योग जगत को क्या संदेश जाएगा? क्या ऐसा कोई फैसला बेहतर विकल्प हो सकता है? सरकार को इन तथ्यों की भी समीक्षा करनी चाहिए।
सच तो यह है कि देश के इस बीमारू राज्य में उद्योग के लिए निवेश से ज्यादा अधोसंरचना के विकास में निवेश को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। नई औद्योगिक नीति में सरकार ने इंडस्ट्रीयल इन्फ्र ास्ट्रक्चर के लिए विशेष फं ड के प्रबंध की बड़ी-बड़ी बातें की थीं ,लेकिन आज भी सच तो यह है कि इस मद में ढांचागत विकास के लिए राज्य सरकार सालाना सिर्फ10 करोड़ रुपए ही खर्च कर रही है। जबकि उद्योग जगत इसके लिए हर साल 1 हजार करोड़ के फंड की जरूरत महसूस करता है। लालफीता शाही से निपटने और उद्योगपतियों की समस्याओं के फौरन निदान के लिए वन टू वन फार्मूले की बात आई थी , लेकिन अमल के सवाल पर नतीजा शिफर है। सिंगल विंडो की सुविधा सरकार अभी तक तय नहीं कर पाई है। बिजली,औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरत होती है। इसी इरादे से राज्य में मध्यप्रदेश विद्युत सुधार अधिनियम 2000 लाया गया था। 1991 में मध्यप्रदेश विद्युत मंडल का विभाजन कर विद्युत वितरण कंपनियां बनाई गईं लेकिन यह कवायद भी अंतत: कारगर साबित नहीं हुई। बिजली कंपनियां आज भी हजारों करोड़ के घाटे से उबर नहीं पाई हैं। राज्य में उर्जा क्षति 30 फीसदी से भी ऊपर है। प्रदेश की 11 बिजली उत्पादन ईकाइयां ओवर एज हैं। मांग के मुकाबले राज्य में रोजाना बिजली की आपूर्ति में1100 मेगावाट की कमी है। पीक ऑवर पर यही मांग बढ़कर 1500 मेगावाट पहुंच जाती है।
राज्य में औद्योगिक विकास की एक और बड़ी विडंबना भूखंडों का अभाव है। कहने को तो सरकार के पास 20 हजार का लैंड बैंक है, लेकिन असलियत यह है कि इंदौर के पीथमपुर में स्थित एशिया के सबसे बड़ेऔद्योगिक क्षेत्र, स्पेशल इकॉनामिक जोन (सेज ) में अब जमीन नहीं बची है। भारत के इस ट्रेटायड के विस्तार के लिए सरकार मक्सी और बेटमा में जमीन देने को तैयार है,लेकिन बुनियाद विकास के अभाव में निवेशक जाने को तैयार नहीं हैं। प्रदेश में छोटे-बड़े 35 औद्योगिक क्षेत्र हैं लेकिन वहां भी जमीन नहीं बची है। उद्योग के लिए न्यूनतम 20-25 एकड़ भूखंड की जरूरत होती है, लेकिन जमीन टुकड़ों में उपलब्ध है। यह भी सच है कि प्रदेश की भौगोलिक स्थित औद्योगिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। सरकार के लिए यह संभव नहीं कि वह हर जगह इन जरूरतों को पूरा कर सके। राज्य का रोजानाऔद्योगिक उत्पादन अभी 5 हजार करोड़ का है।