सोमवार, 11 जुलाई 2011

नारायण की लक्ष्मी और दरिद्र नारायण


पद्मनाभ स्वामी मंदिर की संपदा में स्वामित्व जताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देकर सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार के तेवर ढीले कर दिए हैं। एक हजार करोड़ से भी ज्यादा पुरा संपदा से मालामाल इस मंदिर पर कल तक अपना हक जता रही वहां की कांग्रेस सरकार ने भी कदम खींच लिए हैं। इस बीच देश में मौजूद ऐसी अकूत संपदाओं के औचित्य, स्वामित्व, संरक्षण और उपयोग को लेकर बहस शुरू हो गई है। बहस बेवजह नहीं है। दरअसल इस किस्म की अपार संपदा के भंडारण के बाद भी देश में कानूनी स्तर पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि अमीर हिंदू मंदिरों पर सरकार की गिद्ध दृष्टि लग गई है। मसलन दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने भी मंदिरों में मौजूद संपदा के आकलन की कवायद शुरू कर दी है। जाहिर है अब ऐसी संपदाओं को बेनामी बनाकर इसके राष्ट्रीयकरण की भी मांग उठाई जा सकती है। सवाल यह है कि क्या इन संपत्तियों को सरकार के हवाले किया जा सकता है। भारी भ्रष्टाचार के लिए पहले से ही बदनाम सरकारों के प्रति आम जनमानस में विश्वास का संकट एक बड़ी बाधा है। आजादी के बाद देश की चार बड़ी रियासतों की 4 लाख करोड़ की संपत्ति राजसात करने के मामले केंद्र की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। हैदराबाद के निजाम का 240 करोड़ का खजाना रहा हो या फिर जम्मू-कश्मीर रियासत की 20 हजार करोड़ की संपदा, सरकार ने कभी भी पारदर्शिता नहीं दिखाई है। यह संपदा अब कहां-किस हाल में है? रहस्य कायम है। कहने को तो सरकारें जनहित में काम करती हैं, लेकिन वह कितनी जन हितकारी हैं ? यह किसी से छिपा नहीं है। कालेधन के मामले में सुप्रीमकोर्ट का भरोसा खो चुकी केंद्र सरकार पर अब कौन भरोसा कर सकता है? वस्तुत: ये खजाने सिर्फ संपत्ति नहीं हैं। यह कोई खैराती खजाना नहीं है। राजशाही द्वारा दान में दी गई पूजा भेंट है, जो भगवान को समर्पित है। यह सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत भी है। बेहतर तो यही हो कि इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाई जाए। मंदिरों का स्वामित्व ट्रस्ट के ही पास रहे और ट्रस्ट किसी ऐसे सक्षम राष्ट्रीय आयोग से नियंत्रित और संचालित हो जो ट्रस्टियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करे। आमतौर पर अभी ट्रस्ट स्थानीय प्रशासन से ही संचालित और नियंत्रित हैं। प्रशासनिक अधिकारी ही इसके प्रशासक हैं। आशय यह कि अप्रकट रूप से ट्रस्टों की कमान राज्य सरकारों के ही हाथ में है। अकूत संपदा को आपदा राहत कोष के रूप में इस्तेमाल का सुझाव भी स्वागत योग्य है। सूखा,बाढ़,अकाल और महामारियों के दौरान मंदिरों द्वारा मदद की प्राचीन परंपरा रही है। अच्छा हो इस धन को गरीबों का जीवन स्तर सुधारने पर लगाया जाए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि धार्मिक स्थलों पर पूजा और इबादत के अपने -अपने तौर तरीके होते हैं,लेकिन धन के मामले में सभी धर्मों के लिए समानता का कानून होना चाहिए। ऐसे सभी खजानों को एक नीति नियम के तहत लाया जाए। इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करके सरकार के हवाले करना ठीक नहीं होगा क्योंकि आज अगर हिंदू मंदिरों के साथ ऐसा होगा तो कल मस्जिदों और गिरजाघरों के प्रति भी यही सवाल उठेगा। यह आस्था से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है। कुटिलता से काम नहीं चलेगा।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

कमाल:सांसद मालामाल


क्षेत्रीय विकास के लिए सांसद निधि में150 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ही इस मद के औचित्य पर बहस शुरू हो गई है। इससे पहले बिहार में विधायक निधि बंद करने के राज्य सरकार के फैसले के बाद कमोबेश ऐसे ही सवाल उठे थे। तमाम विरोधों के बीच सरकार का यह फैसला तब आया है,जब पूरा देश भारी भष्टाचार की आग में सुलग रहा है। संसद के अंदर सांसदों को जनलोकपाल के दायरे में लाने की मांग पर बवाल है। 90 से ज्यादा सांसदों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं। तकरीबन 180 सांसद तो ऐसे हैं जो किसी न किसी रूप में अपराधिक चारित्र रखते हैं। वैसे भी यह आम धारणा बन चुकी है कि सांसद मद भ्रष्टाचार का पोषण करता है। आंध्र प्रदेश के 6 जिलों के लिए इसी मद से आवंटित 64 करोड़ बैंक में एफडी की ब्याजखोरी किसी से छिपी नहीं है। चार साल पहले एक स्टिंग के जरिए कुछ सांसदों को ठेके के लिए कमीशनबाजी करते रंगे हाथ पकड़े जाने का मामला पहले ही शर्मशार कर चुका है। आरोप है कि जमीनी स्तर पर विकास के लिए आवंटित यह रकम आमतौर पर या तो राजनीतिक लाभ के लिए खर्च की जाती है। या फिर खर्च ही नहीं की जाती है। सच तो यह है कि इस भारी भरकम फंड के साथ कमीशनबाजी का ख्ेाल काल्पनिक नहीं है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सांसद निधि के इस्तेमाल में ठेकाप्रथा और कमीशनखोरी के तौर तरीकों पर पहले ही अपनी आपत्ति दर्ज करा चुके हैं। कैग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि नियम विरूद्ध सांसद निधि से 11 राज्यों में किस तरह से पीएम-सीएम राहत कोष को 7 करोड़ 37 लाख दिए गए। 14 राज्यों में सांसदों ने एयरकंडीशनरऔर फर्नीचर के अलावा ट्रस्ट के अस्पतालों और स्कूलों को किस प्रकार 6 करोड़ की रकम आवंटित की गई। देश के 6 राज्यों में इसी मद से नामवर लोगों के नाम पर 7 करोड़ खर्च करके निर्माण कार्य कराए गए। सांसद निधि के बेजा इस्तेमाल के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है। तमिलनाडु दूसरे और पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है। इसके बाद क्रमश: असम, सिक्किम, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, नागालैंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल, उत्तराखंड और राजस्थान का नंबर आता है। सरकारी दावे के विपरीत कैग की राय में योजना लागू होने के डेढ़ दशक बाद भी इस मद के 1053.63 करोड़ रुपए आज तक खर्च ही नहीं किए गए हैं। आमतौर पर चुनावी वर्षो में इसे दिल खोल कर खर्च किया जाता है। जाहिर है इस फंड का इस्तेमाल सियासी प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। दूसरे प्रशासनिक आयोग ने भी सांसद निधि को समाप्त करने की सिफारिश की है। आयोग का तर्क है कि सांसदों का काम प्रशासनिक खर्च पर नजर रखना है न कि स्थानीय निकायों के काम हथियाना। नेशनल कमीशन फॉर रिव्यू ऑफ द वर्किग ऑफ कांस्टीटय़ूशन और 2005 में स्वयं सत्तारूढ़ कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षतावाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति भी सांसद निधि के पक्ष में नहीं थी। मगर बावजूद इसके केंद्र सरकार ने सांसदों की सालाना निधि 2 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ कर दी। सवाल यह है कि क्या राजनैतिक नफे-नुकसान के लिए सांसदों को उपकृत करना ही यूपीए सरकार की प्राथमिकता है। क्या यह जानने की जरूरत नहीं कि सांसद निधि का आखिर औचित्य क्या है? क्या वाकई इससे विकास का सरकारी संकल्प पूरा होता है?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

नकली दवाओं के असली खतरे





खाओ तो जहर और नहीं खाओ तो मर्ज से मौत..बाजार में नकली दवाओं के असर का यही सच है। नकली जीवन रक्षक दवाओं का यह जानलेवा जहर बाजार से पसर कर अब कमीशनखोर सरकारी सप्लाई तक पहुंच गया है। राजधानी भोपाल के सबसे बड़े शासकीय अस्पताल हमीदिया समेत 4 अस्पतालों में नकली दवाओं का यूं पकड़ा जाना हालांकि अब चौंकाता नहीं है, लेकिन इसके पीछे छिपा खेल बेहद खतरनाक है। कहने को तो स्वास्थ्य नीति की मोहताज मध्यप्रदेश सरकार की अपनी दवा नीति भी है ,लेकिन दवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता की गारंटी देनेवाली इस नीति के तहत जहां राज्य में दवाओं का दर निर्धारण तमिलनाडु मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन के सुझावों पर निर्भर है। वहीं सरकारी खरीदी के लिए दवा कंपनियों के नाम चैन्नई की आईएमएनएससी सुझाती है। रोजमर्रा के लिए जरूरी 201 ऐसी जीवन रक्षक दवाओं की सरकारी खरीदी की जाती है,जो 96 प्रतिशत बीमारियों के लिए कारगर है। कुल दवा खरीदी का 80 फीसदी बजट प्रदेश के जिला स्तर पर आवंटित है। शेष 20 प्रतिशत राजधानी स्तर पर आरक्षित है। नीति के अनुसार सीएमएचओ और सिविल सजर्न स्थानीय स्तर पर निविदा के आधार पर दवाएं खरीद कर मरीजों को मुफ्त में दे सकते हैं। साफ है कि दवा नीति के इसी लचीलेपन से सौदेबाजी की गुंजाइश बनती है। जाहिर है,सरकारी चिकित्सा तंत्र का एक बड़ा हिस्सा इस काले कारोबार को ताकत दे रहा है। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि राज्य में इंदौर नकली दवाओं का गढ़ है। मध्यप्रदेश समेत देश के 9 राज्यों में नकली दवाओं का सालाना कारोबार 7 हजार करोड़ के आसपास है। एक अनुमान के अनुसार इसमें प्रति पंचवर्षीय दो गुना दर से इजाफा हो रहा है। सितंबर 2008 में अमेरिका ने भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी की तीन जैनरिक दवाओं के खरीदी पर पाबंदी लगा दी थी। अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक मध्यप्रदेश के देवास में निर्मित दवाएं अमेरिका में निर्मित दवाओं के मुकाबले मानक स्तर की नहीं पाई गईं थीं। रैनबैक्सी अकेले अमेरिका को सालाना पौन दो सौ करोड़ डॉलर मूल्य की जेनैरिक दवाओं का आयात करती है। एक विडंबना यह भी है कि सरकार के पास न तो पर्याप्त संख्या में ड्रग इंस्पेक्टर हैं और न ही नमूनों की जांच के लिए सक्षम लैब हैं। नकली दवा माफिया इस कदर हावी है कि उसे केंद्रीय औषधीय एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम के गैर जमानती और आजीवन कारावास जैसे सख्त प्रावधानों की भी परवाह नहीं है। सात साल पहले लिए गए केंद्र सरकार के एक फैसले के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आसानी से सस्ती दर पर पूरी सुरक्षा के साथ ड्रग ट्रायल कर सकती हैं। मुक्त बाजार की उदारवादी व्यवस्था का साइड इफैक्ट यह है कि मौजूदा समय में देश के दवा बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। राज्य सरकार पहले ही स्वीकार कर चुकी है कि हाल ही में 50 दवाओं के लिए 23 सौ मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया गया। जिनमें से 1644 बच्चे और 6 सौ वयस्क थे। असल में दवा कारोबार में लगे मौत के सौदागर बड़े चतुर हैं। वे सरकार की सुस्ती को भी समझते हैं और अफसरशाही की कमजोरियों को भी जानते हैं। जरूरत नकली दवाओं के इन असली खतरों से सतर्क रहने की है।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

लोभ का मायाजाल


मध्यप्रदेश में आधा दर्जन फर्जी चिटफंड कंपनियां रोज उधार की जिंदगी जीने वाले आमजनों की गाढ़ी कमाई का एक हजार करोड़ ठगकर भूमिगत हो गईं और किसी को भनक तक नहीं लगी। होश तो तब आया जब लोभ-मोह का यह मायाजाल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच के संज्ञान में आया। अब अपनी चमड़ी बचाने के लिए जिम्मेदार प्रशासनिक अमला हरकत में है। ग्वालियर के कलेक्टर 33 फर्जी चिट फंड कंपनियों के इश्तेहार लगाकर आम निवेशकों को सतर्क कर रहे हैं। आनन -फानन में ऐसी 22 कंपनियों से जुड़े 98आरोपियों के खिलाफ मुकदमे कायम किए गए हैं। राज्य के दीगर जिलों के जिलाधिकारियों को चिट्ठी लिखकर अलर्ट रहने के सुझाव दिए गए हैं। शिकायतों का अंबार इस कदर है कि सुनवाई के लिए अलग से काउंटर खोला गया है। अकेले ग्वालियर- चंबल संभाग से ठगी की 13 हजार शिकायतें हैं। सवाल यह है कि क्या ये शिकायतें दो-चार दिन में अचानक पैदा हो गई हैं? सच तो यह है कि इससे पहले इन शिकायतों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। आमतौर पर ऐसे मामलों में ऐसा ही होता है। व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि ठगी का शिकार शिकायतकर्ता पुलिस,प्रशासन और कंपनी के बीच उलझकर रह जाता है। कमाल तो यह भी है कि करोड़ों की ठग कंपनियों के मालदार संचालकों की गिरफ्तारी के लिए सरकारी तौर पर दो-दो हजार के ईनाम घोषित किए गए हैं। अब लकीर पीटने की इस कवायद के बीच सबसे बड़ा भय ठगराजों के विदेश भाग जाने का है। गहरे सियासी रिश्तों की अपनी तल्खी और सरगर्मी है। आम निवेशक हतप्रभ हैं। अब तक सबसे बड़ी धोखेबाज कंपनी बनकर उभरी पीएसीएल इंडिया लिमिटेड के एक एजेंट ने जबलपुर में ट्रेन से कटकर खुदकुशी कर ली है। ये छोटे-छोटे लोगों की बड़ी-बड़ी मुश्किलें हैं। ऐसी दगाबाजी कोई नई बात नहीं है। सब जानते हैं कि जब शेड्यूल्ड बैंक में आठ-दस फीसदी एफडी दे रहे हैं ,तो कोई चिट फंड कंपनी साढ़े चार साल में जमाधन को आखिर कैसे दो गुना कर सकती है? यह सिर्फ लोभ की विडंबना नहीं है। बदनसीबी इस बात की भी है कि संवेदन शून्यता जिम्मेदार सरकारी तंत्र का स्थाई चरित्र बन चुकी है। यह आर्थिक धोखाधड़ी कितनी गंभीर है, अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाईकोर्ट ने इस तर्क के साथ मामले की जांच सीबीआई को सौंपी है, कि राज्य सरकार प्रकरण की पड़ताल में सक्षम नहीं है। राज्य के पास इतने संसाधन और अधिकार नहीं हैं कि वह देश के दूसरे प्रदेशों में सक्रिय फर्जी चिटफंड कंपनियों के खिलाफ जांच कर सकें। इंसाफ की खातिर यही बेहतर होगा कि जांच सीबीआई से कराई जाए। सीबीआई को इसके लिए तीन माह का समय दिया गया है। इन फर्जी चिट फंड कंपनियों में निवेश नहीं करने की नसीहत के साथ सेबी भी सुप्रीम कोर्ट चली गई है। मध्यप्रदेश के अलावा पांच राज्यों में ऐसे ही फर्जीवाड़े की आशंका है। जानलेवा महंगाई के बीच प्रदेश के लाखों निवेशकों के खून पसीने की इस कमाई पर बेईमानी का कहर पीड़ा दायक है। पेट काटकर पैसे बचाने की मुश्किलों के ऐसे दुखांत का दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जिसने इसे जीया है। पैरों तले जमीन नहीं है। अभी नहीं तो कभी सही,सुंदर भविष्य के ऐसे सपने टूटे कांच की तरह किर्चे-किच्रे बिखर चुके हैं।

बुधवार, 6 जुलाई 2011

सत्ता के संवैधानिक पतन की पीड़ा


काले धन के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का कोड़ा पड़ते ही यूपीए सरकार के बड़बोले भूमिगत हो गए हैं। सबकी बोलती बंद है। शिखर अदालत का अगर किसी सरकार से भरोसा उठ जाए तो इसके बाद क्या बचता है? क्या यह किसी भी सरकार के संवैधानिक और नैतिक पतन की पराकाष्ठा नहीं है? सीधे भ्रष्टाचार से जुड़े कालेधन के मामले में सरकार की ऐसी क्या लाचारी है? आखिर , सरकार ऐसे किन काले चोरों के बचाने की कोशिश में है, जिनके लिए वह संवैधानिक सत्ता को भी दांव पर लगा सकती है? वैश्विक संधियों का हवाला देकर सरकार इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने नाम उजागर करने से इंकार कर चुकी है। सवाल यह है कि क्या किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को ऐसी विदेशी संधियां करने का संवैधानिक अधिकार है, जो भारतीय संविधान को कमजोर करती हों। क्या कोई भी विदेशी संधि भारतीय संविधान और उससे पोषित सर्वोच्च अदालत से ऊपर हो सकती है? क्या यह विदेश हाथों के साथ संवैधानिक सौदेबाजी नहीं है? तो क्या ऐसी संधियों पर दस्तखत करने वाले देशद्रोही नहीं हैं? मजबूत जनलोकपाल के सवाल पर संवैधानिक सम्मान का स्वांग रचने वाली यह वही यूपीए सरकार है, जिसने इसी कालेधन के सवाल पर अहिंसक आंदोलनकारियों पर लाठियां तोड़ी थीं। सच तो यह है कि असली चरित्र उजागर होने के बाद सरकार मुंह दिखाने के काबिल नहीं बची है। सुप्रीम कोर्ट की पीड़ा को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि अगर यह मामला जनहित याचिका के जरिए संज्ञान में नहीं आता तो काला धन सरकार की प्राथमिकता में नहीं था। देश की एकता,अख्ांडता , अस्मिता और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक हो चुके इस कालेधन के मामले में सरकार ने अपने संवैधानिक दायित्व तक नहीं समङो। सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी के बाद भी सरकार इस मुद्दे की 6 माह से अनदेखी कर रही थी। सरकार नहीं चाहती थी कि मामले का जिम्मा किसी विशेष जांच दल(सिट) को सौंपा जाए। इसीलिए उसने 2 माह पहले आनन फानन में हाईलेवल कमेटी बनाकर अपने 8 सदस्यीय टॉप ब्यूरोक्रेट्स बैठा दिए थे। देश के सबसे बड़े टैक्स चोर हसन अली के खुलासों के बाद भी जिम्मेदार सरकारी एजेंसियों ने राजनेताओं ,नौकरशाहों और कारोबारी हस्तियों से पूछताछ क्यों नहीं की? कालेधन पर लगाम लगाने के लिए तैयार किया गया प्रत्यक्ष कर संहिता विधेयक (डीटीसी) पर लोकसभा की स्थायी समिति एक साल से विचार ही कर रही है। अब अगर यह विधेयक मानसून सत्र में आया तो भी उसे असर में आने में एक साल लगेंगे। सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि पहले से ही बदनाम स्विट्जरलैंड के यूबीएस बैंक को देश में कारोबार के लिए खुदरा बैंकिंग का लाइसेंस क्यों दिया गया? सरकार के पास विदेशों में जमा भारतीय कालेधन का हिसाब भले ही न हो लेकिन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी जैसी वैश्विक संस्थाओं के अनुमान के अनुसार यह रकम 5 सौ अरब डालर से लेकर 14 सौ अरब डालर तक हो सकती है। अमेरिका ,जर्मनी और यूरोपीय देश जब अपने कालेधन की वापसी को लेकर सख्त हैं ,तब भारत का बेहद उदारवादी रवैया भी सरकार की नीयत पर सवाल उठाता है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

संसद के सामने सिविल सोसायटी


एक ताकतवर जनलोकपाल के खिलाफ सियासतदारों की नीयत साफ है। सरकार की ओर से आम सहमति के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का सिर्फएक लाइन का निहितार्थ यही है कि लोकपाल के सरकारी मसौदे से सब सहमत हैं। अकेले अंदाज अलग -अलग हैं। संपादकों के बीच पीएम मनमोहन सिंह जहां प्रस्तावित लोकपाल की शान में कसीदे गढ़ते हैं, वहीं अपनी बिरादरी के बीच पलट कर मौन साध लेते हैं। और तो और प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के इसी सवाल पर लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज हों या राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली सबकी बोलती बंद हो जाती है। वस्तुत: एक अप्रिय सत्य तो यह है कि हमाम में सब नंगें हैं। एक थाली के चट्टे-बट्टे। चोर-चोर मौसेरे भाई। कहना न होगा कि एक सांप नाथ तो दूसरा नाग नाथ। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष समवेत स्वर में अब फिक्र फकत इतनी है कि लोकपाल को शक्तियां देने से लोकतंत्र का संघीय ढांचा बिगड़ेगा। संविधान में संशोधन करने होंगे। क्या यह भारत के जनतांत्रिक संवैधानिक इतिहास में यह पहला संशोधन होगा? सरकारें जब-तब व्यापक जनहित की आड़ लेकर किस कदर संविधान संशोधन करती रही हैं। संशोधन ही संविधान को जीवंत और गतिशील बनाता है। इसमें शक नहीं कि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है। यह भी सच है कि सिविल सोसायटी के कुछ सुझाव संवैधानिक लिहाज से व्यावहारिक नहीं हैं, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि लोकतंत्र में जनपक्ष की भूमिका ही निर्थक है। एक बेहतर लोकतांत्रिक परंपरा के लिए क्या यह शुभ नहीं कि सरकार टकराव के बजाय ,बजरिए सिविल सोसायटी लोकपक्ष के सुझावों का ईमानदारी से सम्मान कर संसार के सामने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र होने की नजीर पेश करे। सवाल यह भी है कि कानून से नियंत्रित कोई भी लोकपाल चाहे वह कितना ही स्वायत्त और शक्तिशाली क्यों न हो लोकतंत्र के लिए खतरा कैसे हो सकता है? सिविल सोसायटी स्वतंत्र लोकपाल चाहती है,स्वछंद नहीं। एक मजबूत जनलोकपाल के खिलाफ लामबंद सियासी साठगांठ के कुल जमा अपने-अपने नुकसान नफे हैं। सरकार इसे कानूनी बाधाओं और सियासी दांवपेंचों में उलझा कर जहां एक बार फिर से दबाने की कोशिश में है, वहीं विपक्ष विधेयक को शीतकालीन सत्र तक टालने के प्रयास में है। क्योंकि अगले साल उत्तरप्रदेश में विधान सभा चुनाव हैं। इस बीच सरकार की एक और कोशिश सिविल सोसायटी को संसद के सामने लाकर खड़ा करने की भी है। खासकर अण्णा निशाने पर हैं अगर वह 16 अगस्त से अनशन पर जाते हैं तो उनकी इस मुहिम को सरकार संसदीय व्यवस्था के लिए खतरनाक मानते हुए लोकतंत्र पर प्रहार केआरोपी के रूप में प्रचारित करेगी।अण्णा के मजबूत जनाधार के खिलाफ चतुर यूपीए सरकार कानून और संवैधानिक मूल्यों की दुहाई को ढाल बनाकर आक्रामक रणनीति अपनाने की तैयारी में है। सियासी स्वांग कुछ भी हो लेकिन संकेत बताते हैं कि जनलोकपाल की राह आसान नहीं है। इसके घोर राजनीतिकरण से जनलोकपाल का जन हितकारी लोकपक्ष लगभग गायब हो चुका है। ताजा परिदृश्य यही है कि तनातनी के बीच सिविल सोसायटी संसद के सामने खड़ी है और सरकार उसे घेर कर मारने की साजिश में लगभग कामयाब है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

संस्कृत से दुराग्रह और देशद्रोह



संस्कृत से दुराग्रह क्या देशद्रोह नहीं? थोड़ी देर के लिए यह सवाल हास्यास्पद लग सकता है,लेकिन संस्कृत के संवैधानिक संरक्षण और इसके प्रति सर्वोच्च अदालत का सम्मान कमोबेश ऐसा ही संगीन सवाल उठाता है। संसद से पारित राष्ट्रीय शिक्षा नीति का त्रिभाषायी फामरूला हो या यूजीसी के दिशा निर्देश या फिर संस्कृत कमीशन की सिफारिशें सब को दर किनार करते हुए सीबीएसई ने एक ताजा फरमान जारी कर 9वीं-10वीं के पाठ्यक्रम से संस्कृत को बाहर कर दिया है। इस आदेश के बाद पब्लिक स्कूलों ने संस्कृत की जगह जर्मन और फ्रेंच पढ़ानी शुरू कर दी है। बोर्ड की इस द्विभाषा नीति से दस हजार वर्षो से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका रही देववाणी संस्कृत अपने ही घर में पराई हो गई है। 1994 की 4 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में स्कूली पाठ्यक्र म में संस्कृत भाषा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया था कि देश की सीमा की तरह उसकी सांस्कृतिक रक्षा भी मुख्य राष्ट्रीय दायित्व है। संस्कृत के अध्ययन और अध्यापन का उद्ेश्य देश की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करना है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई में संस्कृत को एक वैकिल्पक विषय के रूप में पढ़ाने का आदेश दिए थे। क्या सीबीएसई के पाठय़क्रम निर्माताओं को यह भी नहीं मालूम कि देश की संस्कृति को स्वर देने वाली हिंदी शब्दावली के विकास में संस्कृत के योगदान के चलते इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया है? भारतीय संसद द्वारा स्वीकृत संस्कृत कमीशन की राय में संस्कृत भाषा राष्ट्रीय अस्मिता है। यह देश की सांस्कृतिक परंपराओं का ज्ञान कराती है। 1988 की यूजीसी की रिपोर्ट के अनुसार चरित्र निर्माण, बौद्धिक विकास तथा राष्ट्रीय धरोहर के संरक्षण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। सब जानते हैं कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। यह कैसी विडंबना है कि जब अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देशों में संस्कृत का पठन- पाठन निरंतर लोकप्रिय हो रहा है, तब अपने ही देश में यह साजिश की शिकार है। कभी मातृभाषा तो कभी क्लासिकल भाषा के नाम पर संस्कृत को मुख्यधारा से बाहर करने की यह साजिश कोई नई बात नहीं है। 1986 में नई शिक्षा के निर्माण के दौरान तो सीबीएसई ने संस्कृत विषय को ही समाप्त कर दिया था। सवाल यह है कि क्या सीबीएसई बोर्ड भारतीय संविधान और सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है। बात -बात में संविधान की दुहाई देने वाली यूपीए सरकार का क्या यह दायित्व नहीं कि वह संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण करे और इस अपराध को इरादतन राष्ट्रदोह के रूप में संज्ञान में लेते हुए देशद्रोहियों के खिलाफ मुकदमा चलाए ,अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो क्या वह ऐसे तत्वों का पोषण करने की अपराधी नहीं जो सांस्कृतिक हत्या की साजिश रच कर देश को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। धर्म और संस्कृति के नाम पर वोट की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल इस मसले पर रहस्यमयी अंदाज में खामोश क्यों हैं? बहरहाल, सीबीएसई का यह संविधान विरूद्ध भाषाई दुराग्रह समझ से परे है? बेहतर हो कि संस्कृत को जन सामान्य से दूर करने और इसके राष्ट्रीय प्रसार पर प्रतिबंध की गहरी साजिश को वक्त रहते समझ लिया जाए।