शनिवार, 2 जुलाई 2011

लाटसाहब को नक्सलियों का खौफ



आंखें बंद कर लेने से अंधेरा नहीं हो जाता। क्या,नक्सलियों के भय से अकेले राजभवन को हाई सिक्युरिटी दे कर मध्यप्रदेश सरकार राज्य में नक्सली संकट के सच से इंकार कर सकती है? कौन नहीं जानता कि तकरीबन एक दशक से अकूत खनिज -वनज संपदा से भरपूर प्रदेश के बालाघाट,मंडला, डिंडौरी,सीधी,सिगरौली, शहडोल और उमरिया समेत 7 जिले नक्सलवादियों के प्रभाव में हैं। देखते ही देखते 7 साल के अंदर प्रदेश का पावर हब सिगरौली नक्सलियों का बेस कैंप बन गया है। आधा दर्जन पावर प्लांटों की स्थापना में लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के 40 हजार से भी ज्यादा मजदूरों के बीच माओवादी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में हैं। यह सुखद है कि मध्यप्रदेश में नक्सलियों ने कोई बड़ी वारदात नहीं की है ,लेकिन राजधानी भोपाल में नक्सलियों की हथियार फैक्ट्री के पर्दाफाश के साथ केंद्रीय तकनीकी समिति के सदस्य समेत 5 हार्डकोर नक्सलियों की गिरफ्तारी उनके ताकतवर मूवमेंट की पुष्टि करती है। क्या सरकारी सतर्कता के लिए इतना ही काफी नहीं कि पांच राज्यों की सीमा से जुड़ा मध्यप्रदेश नक्सलियों की खास रणनीति का सेफ जोन है। बहुत संभव है कि मजबूत रेड कॉरीडोर के विस्तार के लिए नक्सलियों को मध्यप्रदेश में पश्चिम बंगाल के लालगढ़ और उड़ीसा के नारायण पट्टन जैसे गुरिल्ला जोन के ऐसे आसार दिखते हों ,जहां अब नक्सलियों की सत्ता पर सरकार का नियंत्रण नहीं चलता। क्या ,वामपंथी आतंक की यह वही रणनीति तो नहीं जो उसे प्रदेश में बड़ी वारदातों से फिलहाल रोकती हो? सवाल संगीन है। वैसे भी नक्सलवाद अकेले मध्यप्रदेश की समस्या नहीं है। 40 साल के अंदर नक्सली देश के मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,उड़ीसा,बिहार,पश्चिमी बंगाल,झारखंड और आंध्र प्रदेश समेत 8 राज्यों
के 220 जिलों के30 फीसदी भूभाग पर काबिज हो चुके हैं। इस बीच 1 लाख से भी ज्यादा बेकसूरों की हत्याओं का इल्जाम इनके माथे पर है। सालाना 25 से 30 अरब की वसूली करने वाले इन सशस्त्र माओवादियों से निपटने के लिए अकेले केंद्र सरकार अब तक 4 हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। दरअसल, केंद्र की फिक्र बेमानी नहीं है। ये देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सरहद पार पोषित आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक हैं, क्योंकि इन्हें आमतौर पर स्थानीय समर्थन भी हासिल होता है। अरुन्धति राय,मीरा नायर और बिनायक सेन जैसे मार्क्‍सवादी मार्का बौद्धिक समर्थकों की बड़ी जमात भी नक्सलियों के सशस्त्र आतंकी हिंसा को हक के लिए संघर्ष की संज्ञा देती है। सवाल यह है कि अगर गरीबी से बेहाल नक्सली अपने हक के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं तो फिर वे सरकार के विकास कार्यो को बल पूर्वक बाधित क्यों करते हैं? क्या वे इतना भी नहीं जानते कि बुनियादी विकास ही गरीबी उन्मूलन का व्यावहारिक विकल्प है। सच तो यह है कि नक्सली मूवमेट अब वैचारिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के हाथ में हट कर ऐसी ताकतों के पास है, जो विदेशों से वित्त पोषित होकर देश को कमजोर करने की कोशिश करते हैं,लेकिन राज्य सरकारों की चिंताएं सिर्फ केंद्र से विशेष पैकेज की मांग पर केंद्रित होती हैं। वर्ना नक्सलियों के खिलाफ मध्यप्रदेश सरकार की नीति और रणनीति आज भी पहेली क्यों है? नक्सल प्रभावित इलाकों में भरोसेमंद पुलिस आधुनिकीकरण का सच किसी से छिपा नहीं है। प्रभावित राज्यों के बीच परस्पर सहयोगात्मक रणनीति रंग क्यों नहीं दिखा रही है? सरकार की विकास योजनाएं नक्सली विस्तार को रोक पाने में नाकाम क्यों हैं?

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

भारत से भयभीत अमेरिका


वैश्विक मंदी के बीच संतुलित भारतीय अर्थव्यवस्था से अगर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा अभिभूत हों और उनके वजीरे खजाना टिमोथ गेटनर गदगद..तो भारत सरकार के वित्तीय रणनीतिकारों को खुशफहमी पालने के बजाय सतर्क हो जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था का गुणगान करने वाले ये वही ओबामा हैं, जिन्होंने एक ओर अमेरिका को अभूतपूर्व मंदी से उबारने के लिए भारत से मदद मांगी तो दूसरी ओर आउट सोर्सिग के सवाल पर भारत को झटका देने में देर नहीं की। असल में विश्व के पटल पर तेजी के साथ मजबूत होती भारतीय अर्थव्यवस्था से अमेरिका भयभीत है। देश की अर्थव्यवस्था अब एक खरब डॉलर वाली हो गई है। विदेशी मुद्रा कोष 132अरब डॉलर के पार जा चुका है। अंदर की बात तो यह है कि अमेरिका को भारत से आर्थिक महाशक्ति के तख्ता पलट का खतरा नजर आने लगा है। अमेरिका की तर्ज पर अब ब्रिटेन भी जहां आउट सोर्सिग के लिए भारत के दरवाजे बंद करने की तैयारी में है,वहीं चालाक चीन की भी पल-पल पर नजर है। आर्थिक सुधारों और विकास के सवाल पर विश्व के सामने किसी जादुई करिश्मे की तरह रोल मॉडल बन कर उभरे भारत को अस्थिर कर असल मुद्दे से भटकाने के लिए ये वैश्विक शक्तियां कभी भी कूटनीतिक हथियारों का इस्तेमाल कर सकती हैं। असल में अंदर से बौखलाए अमेरिका की सबसे बड़ी फिक्र भारतीय प्रतिभाओं की स्वदेश वापसी है। विश्व की सुप्रसिद्ध मानव संसाधन सलाहकार संस्था माफोई रेडोस्टेंड के ताजा अनुसंधान की मानें तो एक साल के अंदर भारतीय प्रतिभाओं की स्वदेश वापसी में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। अमेरिका किसी भी हालत में दुनिया के सबसे योग्य भारतीय प्रवासियों को खोना नहीं चाहता है ,लेकिन भारत के इतिहास में शायद यह पहला दौर है जब विश्व की अर्थव्यवस्था में अविस्मरणीय योगदान देने वाली प्रतिभाएं अब भारत के बहुमुखी विकास के संकल्प के साथ स्वदेश लौट रही हैं। कभी प्रतिभा पलायन के संकट से जूझ रहे भारत जैसी हालत आज अमेरिका की है। माना जा सकता है कि भारतीयों के लिए आउट सोर्सिग के रास्ते बंद करने का अमेरिकन फैसला ऐसी ही किसी बौखलाहट का नतीजा है। अमेरिका अपने एक बड़े इस आसन्न नुकसान से अनभिज्ञ नहीं है। वह कैसे भूल सकता है कि विश्व के केपीओ (नॉलेज प्रोसेसिंग आउट सोर्सिग)सेक्टर में आज भारत की भागीदारी 70 प्रतिशत के करीब है। बेशक,आज अगर भारतीय ग्लोबल लेबल पर नॉलेज हब बन गए हैं, तो इसके पीछे सिर्फ एक वजह यह है कि सस्ती दर पर पूरी दक्षता के साथ काम की गुणवत्ता समूची दुनिया में अकेले भारत और भारतीयों में ही संभव है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विश्व के विकसित देश आज भारत के लिए भले ही आउट सोर्सिग के रास्ते बंद कर दें ,लेकिन वे आउट सोर्सिग के लिए अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत आगमन के रास्ते बंद करने की हालत में नहीं हैं। अमेरिका हो या यूरोप विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौरान पूरी दुनिया विकासशील और संतुलित अर्थव्यवस्था का करिश्मा देख चुकी है। संसार यह समझ चुका है कि विपरीत परिस्थितियों के बीच अगर भारतीय अर्थव्यवस्था संतुलित है, तो इसके पीछे का रहस्य भी भारतीय प्रतिभाओं का आर्थिक प्रबंधन ही है।

गुरुवार, 30 जून 2011

मनमोहन का मीडिया मैनजमेंट


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मानें तो झगड़े की असली जड़ खंडित जनादेश है। जिसने अपनी दम पर केंद्र में कांग्रेस की ताजपोशी के सपने तार-तार किए हैं। जिसने देश में यूपीए की साझा सरकार लाद रखी है। अब, अगर गठबंधन की मजबूरियों के आगे प्रधानमंत्री लाचार हैं, तो इसमें उनका क्या कसूर है? जनतंत्र में जनता के लिए जनता के द्वारा जनता की सरकार का निर्माण आखिर जनमत से ही तो होता है। अब जैसा भी है,जनादेश सिर माथे पर है। ऐसे में नैतिक जिम्मेदारी लेकर अगर मनमोहन पद से इस्तीफा देने की नहीं सोचते हैं तो यह भी उसी जनादेश के प्रति उनका नैतिक सम्मान ही है ,क्योंकि इससे सरकार हिल सकती है। वैसे भी महंगाई की मार से दोहरी हो रही जनता असमय एक और चुनाव बर्दाश्त करने की हालत में नहीं है। पिंट्र मीडिया के चुनिंदा संपादकों की इस बैठक में प्रधानमंत्री से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि एक नामांकित सांसद के रूप में आप आखिर किस निर्वाचित जनादेश का परिणाम हैं? अगर टू-जी स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों की हद तक गठबंधन सरकार लाचार है, तो क्या उसे सत्ता में बने रहने का अधिकार है? प्रधानमंत्री कहते हैं, आवंटन में भ्रष्टाचार का आकलन मुमकिन नहीं है। सवाल तो यह है कि जब वित्त और दूरसंचार मंत्रलय ने पहले आओ पहले पाओ की नीति बदल कर बोली के जरिए टू-जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस देने की सिफारिश की थी तो आपने किस विवशता के कारण इसे मानने से इनकार कर दिया था? मनमोहन ने कहा कि कालेधन को स्वदेश लाने के हर संभव प्रयास कि ए जाएंगे? मगर उनसे यह कौन पूछे कि कालेधन की स्वदेश वापसी की प्रक्रिया और समय सीमा क्या होगी? उनसे किसी ने यह भी पूछने की जरूरत नहीं समझी कि अगर बाबा रामदेव के आंदोलन के साथ पुलिस का हिंसक बर्ताव दुर्भाग्य पूर्ण था तो आखिर किस मजबूरी के चलते पुलिस को गुंडागर्दी की इजाजत दी गई? अर्थशास्त्र में माहिर मनमोहन ने स्वीकार किया कि महंगाई से लड़ने के सभी हथियार उनके पास नहीं हैं । अब उनसे यह भी कौन पूछे कि महंगाई के महासमर में आप अगर आप निहत्थे हैं, तो इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? और किस जादुई छड़ी की दम पर आप जल्दी ही इसे 7 प्रतिशत पर लाने वाले हैं? पीएम ने कहा वह दोषी हैं मगर उतने नहीं.. प्रधानमंत्री की मीडिया नीति में आया ताजा बदलाव बताता है कि सचमुच उन्हें अपनी भूलों का तत्वज्ञान हो गया है। सात साल में यह तीसरा मौका था, जब बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया से मुखातिब हुए हैं। इसी साल फरवरी में वह इलेक्ट्रानिक मीडिया और पिछले साल सितंबर में प्रिंट मीडिया के संपादकों से रूबरू हुए थे। अब हर हफ्ते मीडिया से मुलाकात का इरादा है। भ्रष्टाचार खासकर जनलोकपाल बिल पर सरकार की घेराबंदी के बीच प्रधामंत्री मनमोहन सिंह से चुप्पी तोड़ने की दरकार थी। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के सवाल पर उनकी निजी राय का उत्सुकता से इंतजार था। यह दीगर बात है कि उनकी स्वीकारोक्ति में कोई नई बात नहीं है। इससे पहले पीएम की ही हैसियत से अटल विहारी वाजपेयी और उनसे भी पहले मोरार जी देसाई भी लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने के पक्षधर थे, लेकिन इन सब का भी एक ही धर्मसंकट था। मंत्रीमंडल के सहयोगी ना तो तब इसके पक्षधर थे और ना ही अब हैं।

बुधवार, 29 जून 2011

उम्मीदों की उड़ान


राजधानी भोपाल के राजाभोज विमान तल को इंटरनेशनल टर्मिनल की सौगात से आज अगर देश के दिल मध्यप्रदेश की आंखों में ग्लोबल होने के सप्तरंगी सपने तैर रहे हैं ,तो इसके पीछे छिपी है,उम्मीदों की ऊं ची उड़ान..बेशक, यह सौगात मध्यप्रदेश के वैश्विक विकास का मॉडल है। प्रादेशिक प्रगति की प्रतीक है और तेज आर्थिक विकास का पर्याय भी है। अंतरराष्ट्रीय राजाभोज एयरपोर्ट अब देश के प्रमुख हवाई अड्डों में शुमार है। अभी तक भोपाल से सिर्फ दिल्ली-मुंबई समेत देश के सिर्फ 8 शहरों के लिए हवाई सेवा उपलब्ध थी ,लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का रास्ता साफ है। दरअसल,उपलब्धि के इस सुपर हाईवे ने विश्व बिरादरी के लिए पर्यटन उद्योग के अनगिनत रास्ते खोल दिए हैं। पर्यटन उद्योग की अपरमित संभावनाओं वाला मध्यप्रदेश अब देश के मेगा टूरिज्म सर्किट से सीधे जुड़ गया है। देश में सालाना 15 फीसदी की रफ्तार से विदेशी मेहमानों की तादाद बढ़ रही है। दुनिया में भारत पांच ऐसे शीर्ष पर्यटक स्थलों में से एक है,जहां हर साल 8.8 प्रतिशत की दर से पर्यटन उद्योग विकसित हो रहा है। इस उद्योग से सालाना 25 से 30 हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा अजिर्त करने वाला भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश है। देश की 6 प्रतिशत श्रमशक्ति को पर्यटन से रोजगार मिल रहा है। उम्मीद लगाई जा सकती है कि मध्यप्रदेश में पर्यटन उद्योग के विकास से ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अपार अवसर बढ़ेंगे। तथ्य तो यह है कि प्रदेश का हर संभाग पर्यटन का मेगा सर्किट बन सकता है। पांच लोक संस्कृतियों के समावेशी संसार मध्यप्रदेश का लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, कला, बोली और परिवेश ही नहीं अपितु जनजातियों की आदिम संस्कृति का विशाल फलक विदेशी सैलानियों को सदैव लुभाता रहा है। विंध्य - सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाएं इसे जहां नैसर्गिक बनाती हैं,वहीं नर्मदा समेत 6 बड़ी नदियों के उद्गम इसे और भी विहंगम बनाते हैं। कालिदास और तानसेन। कला,शिल्प और अद्भुत स्थापत्य। राजतंत्र का वैभवशाली इतिहास। बांधवगढ़,कान्हा, माधव और पन्ना जैसे नेशनल पार्क। पंचमढ़ी, भेड़ाघाट, अमरकंटक, खजुराहो, मांडू,ओरक्षा,ग्वालियर,चंदेरी, इंदौर,सांची, भीम बैठका,उदय गिरि,मैहर,चित्रकूट , महाकालेश्वर,ओंकारेश्वर और भोजपुर। प्रदेश में वैभवपूर्ण पर्यटन की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। सरकार अगर चाहे तो वह प्रदेश के सभी टूरिज्म सर्किटों को एयर टैक्सी के जरिए जोड़ कर देश को टूरिज्म स्टेट की सौगात सौंप सकती है। सामरिक लिहाज से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रदेश के तमाम बड़े शहरों में बनाई गई हवाई पट्टियों का विकसित कर इन्हें निकटतम हवाई अड्डों से जोड़ा जा सकता है। प्रदेश के भोपाल,इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में यह नेटवर्क पहले से मौजूद है। राज्य में हवाई सेवा के विस्तार के लिए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और राज्य सरकार के साझा प्रयास भी सराहनीय हैं। प्राधिकरण ने देश के जिन 35 हवाई अड्डों के विस्तार की योजना बनाई है, उनमें प्रदेश के भोपाल,इंदौर, खजुराहो और जबलपुर शामिल हैं। भोपाल के नेशनल एयरपोर्ट का विस्तार तो कुछ यूं किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इसे कार्गो कॉम्लेक्स के रूप विकसित किया जा सके। कहना न होगा कि प्रदेश के औद्योगिक और वाणिज्यिक विकास की दिशा में भी यह सौगात मील का पत्थर साबित होगी।

मंगलवार, 28 जून 2011

सरकारी डॉक्टरों का इलाज कीजिए


झूला डालने की कोशिश में सात साल के अंश का पैर फिसला और उसके बाएं हाथ की कोहनी की हड्डी चटक गई। राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया के जूनियर डाक्टरों ने आनन-फानन में पक्का प्लास्टर बांधा और फटाफट छुट्टी कर दी। असहनीय दर्द के बीच जब अंश के नाखून नीले और हाथ का रंग काला पड़ने लगा तो उसके हैरान पिता ने फिर से हमीदिया की शरण ली। पता चला अंश को तो गैंगरीन हो गया है। अच्छा खासा अंश अब विकलांग है। उसका बायां हाथ काट देने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं था।..इसी हमीदिया के शिशु वार्ड में भर्ती नवजात आरूषि इन्क्यूबेटर में सिकाई के दौरान बुरी तरह से जलकर जख्मी हो गई।.. गंजबासौदा के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ने बोबेरॉन की जगह पेंसिलिन का इंजेक्शन देकर रामस्वरूप से उसकी जिंदगी छीन ली। धरती के इन कलयुगी भगवानों की ऐसी जानलेवा करतूतों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। आए दिन ऐसी सुर्खियां अब सरेआम हैं। सवाल यह है कि क्या सरकारी क्षेत्र की इस हद तक अराजक चिकित्सकीय कुव्यवस्था का मर्ज अब वाकई लाइलाज हो चुका है? सच तो यह है कि राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का अधोसंरचना विकास अभी भी बाधित है। मानव विकास प्रतिवेदन की मानें तो राज्य में 26 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। गंभीर स्वास्थ्य संकेतांकों के बीच यह अचरज की बात नहीं कि मध्यप्रदेश सरकार की अपनी कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है। स्वास्थ्य नीति के नाम पर सरकार के पास 9 साल पुराना डेनमार्क की कंपनी डेनिडा का एक ड्राफ्ट है मगर, यह प्रारूप भी खराब स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकार के बजाय नागरिकों को जिम्मेदार मानता है। यह प्रारूप स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की भी सिफारिश करता है। अलबत्ता बाजारू दबाव के चलते राज्य की अपनी दवा नीति जरूर है। उधर,शासकीय चिकित्सा व्यवस्था के समनांतर निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का एक ऐसा बड़ा बाजार खड़ा हो चुका है, जो सरकारी क्षेत्र के डाक्टरों को हमेशा लुभाता रहा है। कौन नहीं जानता के पैसे के लोभ में सरकारी क्षेत्र से निजी क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था को वॉकओवर मिलता है। यही वजह है कि सरकारी अस्पताल चिकित्सा और सुविधाओं के मामले में महज नाम के रह गए हैं। निजी क्षेत्र की चिकित्सा सेवाएं सरकारी डाक्टरों के लिए धन के असंख्य स्त्रोत खोलती हैं। मनमानी फीस,महंगी जांचें और जैनेरिक दवाओं को खपाने में बतौर कमीशन मनमानी मुनाफे ने चिकित्सकों के भाव आसमान पर पहुंचा दिए हैं। क्या, हमीदिया प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल के स्टाफ पर सरकारी नियंत्रण जैसा कोई दबाव नहीं है। पैसे के लिए ऊपर से नीचे तक गठजोड़ काम करता है। नैतिकता और संवेदनशीलता की कोई गुंजाइश नहीं है। कहने को तो तमाम कानून कायदे हैं, लेकिन सब के सब बेमानी हैं। जांच के नाम पर लीपापोती,लामबंदी और सांठगांठ है। प्रायवेट प्रैक्टिस पर पाबंदी हो या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देने की वैधानिक बाध्यता या फिर चिकित्सा महाविद्यालयों में जूनियर डाक्टरों की एलानिया गुंडागर्दी। तलख मिजाजी और बदसलूकी के लिए मशहूर सरकारी डॉक्टरों के पास पेसेंट और उसके अटेंडेंट के लिए सिर्फ एक ही जुमला होता है-डाक्टर तुम हो,या मैं..

सोमवार, 27 जून 2011

गरीबों की भी सुन लो सरकार



बेलगाम महंगाई के मौजूदा दौर में पेट्रोलियम पदार्थो की दर वृद्धि के एक और झटके के बीच यूपीए सरकार की टैक्स मद में कटौती और अतिरिक्त आर्थिक बोझ स्वयं बर्दाश्त करने का साहसिक फैसला वास्तव में स्वागत योग्य है। देश के कांग्रेस शासित राज्यों में ऐसे ही उपायों को अनिवार्य रूप से अपनाए जाने के निर्देश भी काबिले तारीफ हैं। सर्वाधिक साधुवाद की पात्र तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनज्री हैं, जिन्होंने राज्य की आम जनता के व्यापक हित में रसोई गैस से उपकर वापस लेने के फैसले पर देर नहीं लगाई। यूपीए सरकार के महत्वपूर्ण सहयोगी दल की मुखिया ममता डीजल,पेट्रोल और घरेलू गैस में मूल्य वृद्धि के शुरू से खिलाफ रही हैं। इसी तरह प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी वामदलों के साथ पेट्रोलियम उत्पादों के भाव बढ़ाने के खिलाफ है। सवाल यह है कि मध्यप्रदेश समेत देश के दीगर राज्यों की भाजपा सरकारें क्या आम आदमी को महंगाई की मार से राहत देने के इस संवेदनशील मसले पर ऐसी ही दरियादिली दिखाएंगी? या फिर भाजपा की कथनी और करनी का एक और गहरा फर्क असली चरित्र के रूप में सामने आएगा? प्रदेश के वित्त मंत्री राघव जी पहले ही कह चुके हैं कि अगर केंद्र सरकार पेट्रोलियम पदार्थो पर एक्साइज डय़ूटी घटाती है, तो राज्य सरकार भी ऐसा करने पर विचार कर सकती है। सब जानते हैं कि केंद्र सरकार ने कच्चे तेलों और डीजल पर कस्टम तथा एक्साइज डय़ूटी घटाकर सरकारी खजाने के लिए सालाना 49 हजार करोड़ के बजट संकट की मुसीबत मोल ले ली है। यहां गौर तलब तथ्य यह भी है कि पेट्रोलियम पदार्थो के मद से देश में सर्वाधिक टैक्स वसूलने वाली मध्यप्रदेश सरकार भी अगर ऐसा ही साहसिक कदम उठाती है, तो इससे उसकी माली हैसियत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।आर्थिक मामलों के जानकारों की मानें तो डीजल,केरोसिन और एलपीजी के दामों की हालिया दर वृद्धि से राज्य शासन को टैक्स के जरिए सालाना 265 करोड़ का अतिरिक्त लाभ होगा अगर सरकार अकेले इसी वृद्धि को कर मुक्त करने का नैतिक साहस दिखा दे तो इससे प्रति सिलेंडर पर 39 रुपए और प्रति लीटर डीजल पर 8 रुपए की राहत फौरन मिल सकती है। वैसे भी सरकार को अकेले डीजल से हर साल 28 सौ करोड़ और एलपीजी से 75 करोड़ रुपए की घर बैठे आमदनी होती है। राज्य सरकार इन दोनों मदों से वैट और इंट्री टैक्स के रूप में 32.39 प्रतिशत कर वसूलती है। बेहतर तो यह हो कि सरकार इंट्री टैक्स को भी न्यूतम करके गरीबों की मुश्किलें आसान कर सकती है। देश के ज्यादातर राज्यों में यह कर या तो लागू नहीं है या फिर नहीं के बराबर है। सरकार को यह भी समझना चाहिए कि महंगाई की मार से आम आदमी को निजात अकेले केंद्र का विषय नहीं है। राज्य ऐसे तर्क देकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता है। प्रदेश में प्रति लीटर पेट्रोल पर 13 रुपए का टैक्स लग रहा है। प्रदेश में आम आदमी के मासिक खर्चे में10 फीसदी का इजाफा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली के मुकाबले भोपाल में रोजाना 6 रुपए के मान से ज्यादा महंगाई का अनुमान है। अकेले डीजल में वृद्धि से माल भाड़ा बढ़ने के कारण फल और सब्जी जैसी रोजमर्रा की जरूरी खाद्य वस्तुओं में 10 प्रतिशत महंगाई का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है। ऐसे में सिर्फ राज्य सरकार से ही राहत की दरकार है।

शनिवार, 25 जून 2011

पेट्रोलियम कंपनियों की सरकार


पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी कुछ भी कहें,लेकिन यूपीए सरकार बगैर कुछ सोचे-समङो एक बार फिर से अपनी चहेती पेट्रोलियम कंपनियों के सामने बिछ गई है। पेट्रोलियम पदार्थो के लिए गठित अधिकार प्राप्त मंत्री समूह (ईजीओएम) ने यह फैसला लेने से पहले आम आदमी के हितों की फिक्र नहीं की है। असलियत तो यह है कि सरकार की सारी चिंता तेल विपणन कंपनियों पर ही केंद्रित है। उलटे आम आदमी के हितों के सवाल पर सरकार इसे मामूली इजाफा बताकर आग में घी डालने का काम कर रही है। सरकारी गणित के मुताबिक इससे पेट्रोलियम कंपनियों को चालू माली साल के दौरान 21 हजार करोड़ की राहत मिलेगी मगर बावजूद इसके लागत से कम कीमत पर उत्पाद बेचने के कारण एक लाख 20 हजार करोड़ का नुकसान बराबर बना रहेगा। यानि घाटे की आड़ में सरकार अभी और दर वृद्धि की गुुंजाइश भी बना कर चल रही है। एक और सरकारी दावे पर यकीन करें तो पेट्रो पदार्थो की कीमतों को काबू में रखने के लिए कच्चे तेल पर लगने वाले पांच फीसदी सीमा शुल्क को खत्म कर दिया गया है। डीजल पर सीमा शुल्क 7.5 प्रतिशत से घटाकर 2.5 कर दिया गया है। इसके अलावा उत्पाद शुल्क को भी 4.60 रु पए प्रति लीटर से घटाकर दो रु पए कर दिया गया है। यानि सरकार यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रही है कि उसे इन शुल्कों में कटौती के कारण वित्तीय वर्ष के दौरान 49 हजार करोड़ का राजस्व घाटा होगा। इससे सीमा शुल्क में 26 हजार करोड़ और उत्पाद शुल्क में23 हजार करोड़ के नुकसान का अनुमान है। सरकार अब इसी मामले में राज्य सरकारों से भी ऐसी उम्मीद रखती है। अपने बचाव में सरकार ने साफ किया है कि डीजल,केरोसिन और रसोई गैस के मूल्यों में बढ़ोत्तरी कोई राजनैतिक फैसला नहीं है वरन यह एक आर्थिक मामला है, लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों पर मेहरबान यूपीए सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि ये सभी पेट्रोलियम पदार्थ आम आदमी के रोजाना उपभोग से जुड़े हुए हैं और अप्रकट रूप से ये सीधे खाद्य वस्तुओं को प्रभावित कर महंगाई को फुटबाल की तरह उछाल देते हैं। जाहिर है सरकार की सिर फुटौव्वल तय है। इस मामले में सरकार के प्रमुख सहयोगी दल तृणमूल, वामदलऔर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी लामबंद हैं। सवाल यह भी है कि अगर टैक्स घटाने के बाद भी तेल कंपनियों को डीजल पर प्रति लीटर18 रु पए ,केरोसिन पर 29 रु पए और पेट्रोल पर प्रति लीटर 1.99 रु पए का नुकसान हो रहा है तो पाकिस्तान जैसे दुनिया के दीगर देशों में आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोलियम के यही पदार्थ 30 से 50 फीसदी सस्ती कीमतों पर किस जादुई करामात से उपलब्ध हैं ? यह तब हो रहा है, जब दुनिया के कमोवेश सारे देशों का एक ही तेल बाजार है और आपूर्ति की शर्ते भी समान हैं। सरकार अब यह कह कर अपना पल्ला झाड़ रही है कि पेट्रोलियम कंपनियां तेल के मूल्य स्वयं तय करती हैं, और इसमें सरकार का कोई जोर नहीं है ,लेकिन सरकार यह भूल रही है कि उसने पेट्रोलियम पदार्थो के दामों को नियंत्रण मुक्त करने के दौरान शून्य शुल्क का वादा किया था । सरकार की वादा खिलाफी आज अगर आम आदमी के लिए आफत बन गई है तो कल स्वयं के लिए फांसी का फंदा भी बनेगी।