शुक्रवार, 17 जून 2011

नपुंसक पुलिस



तेज धारदार हथियार के साथ एक युवक बाकयदा राजधानी भोपाल के बैरसिया थाने में आता है और लॉकप में बतौर हिरासत बंद एक नाबालिग के अपहरण और उससे ज्यादती के आरोपी पर जानलेवा हमला करके आराम से चला जाता है। इस मामले में पुलिस न केवल तमाशबीन बनी रहती है,अपितु वह बराबर की भागीदार भी होती है। इसी बीच मरणासन्न बंदी पर पुलिस आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा ठोंक देती है। मध्यप्रदेश के न्यायिक सेवा के इतिहास में संभवत:अपने किस्म का यह पहला मामला है,जब अदालत ने ऐसे किसी प्रकरण को स्वयं संज्ञान में लेकर किसी विचाराधीन कैदी की हत्या की कोशिश के इल्जाम में पूरे थाने के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 के तहत मुकदमा कायम किए जाने के आदेश दिए हैं..यूपी के लखीमपुर खीरी जिले के निघासन थाने में 14 साल की एक नाबालिग के साथ मनमानी के बाद उसकी गला दबा कर हत्या कर दी जाती है और हत्या को आत्महत्या की शक्ल देने के लिए मासूम की लाश थाना परिसर में ही पेड़ पर फांसी में लटका दी जाती है..मुंबई से लगे ग्रामीण इलाके की एक खेतिहर मजदूर महिला के सामने ही 6 वहशी दरिंदे पहले उसके पति की हत्या कर देते हैं और फिर गैंग रेप करते हैं। फरियाद लेकर थाने पहुंची पीड़िता के साथ पुलिस भी बदसलूकी करती है और उसके पति की हत्या को आत्महत्या में बदल कर मुकदमा कायम कर लेती है..कल्याण की एक कोर्ट में पेशी में आए दो चोर अदालत को बताते हैं कि लॉकप में पुलिस ने किस तरह से उन दोनों को परस्पर समलैंगिक संबंध बनाने के लिए मजबूर कर दिया..सवाल यह है कि राष्ट्र भक्ति और जनसेवा का स्वांग रचने वाली पुलिस के इस अराजक राज में आखिर कानून की हैसियत क्या है? अगर यही कानून का राज है तो फिर जंगलराज की परिभाषा क्या है? ब्रिटिशकालीन संस्कृति और संस्कारों में पली-बढ़ी हवशी और हिंसक पुलिस अगर आजादी के 6 दशक बाद रत्ती भर भी संवेदनशील और मानवीय नहीं हो पाई है, तो इसके प्रति आखिर जवाबदेही किसकी है? असल में इस देश के अंदर साजिशन पुलिस सुधारों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया। वस्तुत: सत्ता की शक्ति पुलिस, सियासतदारों से ही पोषित,संचालित और नियंत्रित है। शक्ति के प्र्दशन में सत्ता प्राय: पुलिस को अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। हाल ही में शांतिपूर्ण सत्याग्रह पर दिल्ली पुलिस की दरिंदगी ,इसी तथ्य की ताजा मिसाल है। कहना न होगा कि पुलिस अमले में जमीनी स्तर पर बेइंतहा तनाव और अवसाद उसकी कार्यप्रणाली का अनिवार्य हिस्सा है। जो उसे अधिकतम क्रूर,आक्रामक, निरंकुश और काफी हद तक नपुंसक बनाता है। नेशनल क्र ाइम रिकॉर्ड ब्यूरो की मानें तो उसे पूरे देश में पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें एमपी से मिलीं। यूपी दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है। एमपी का हर पांचवां पुलिसकर्मी दागी है। प्रदेश पुलिस से जुड़ा एक सनसनीखेज पहलू यह भी है कि डय़ूटी के दौरान जिंदगी से हार मानकर आत्महत्या करने वाले पुलिसकर्मियों के मामले में भी मध्यप्रदेश, देश में सबसे आगे है। नौकरी के दौरान देश में कुल 139 पुलिसवालों ने खुदकुशी की जिनमें से सबसे ज्यादा 31 पुलिसवाले मध्यप्रदेश के थे।

गुरुवार, 16 जून 2011

सोनम की मौत पर माया की मातमी सियासत



महज 14 साल की बदनसीब सोनम तो चली गई, लेकिन वह अपने पीछे छोड़ गई है, इंसानियत का कालिख पुता खौफनाक चेहरा..जिस्म और जिंदगी की भूखी हैवानियत का वहशी चेहरा, लेकिन शर्त यह है कि यूपी के एक थाने में पेड़ पर झूलती मासूम की लाश पर अब शर्मसार होने की गुंजाइश नहीं है। अब न आंखें नम होती हैं ,न दिल पसीजता है। दरअसल, आज के इस मौका और मतलब परस्त तेज रफ्तार दौर में अब अपनापन नहीं रहा। खून तो जैसे पानी हो गया है। अलबत्ता, राहगीरों के कदम आज भी ठिठकते हैं। तमाशबीनों की शक्ल में मजमा लगाकर भीड़ खुद ब खुद भीतर से टूटती है और, और.. फिर किर्चे-किर्चे बिखर जाती है। शैतानियत से मुकाबला कैसा? मुंह मोड़कर खिसक लेने के रिवाज हैं,यहां। थाने में एक नाबालिग से रेप और फिर गला दबाकर कर कत्ल के बाद आखिर कुछ कहने को बचता ही कहां है? लेकिन कमाल देखिए, सूबे की सीएम मायावती खामोश नहीं हैं। उन्हें सोनम के इस दुखांत में भी सियासत ही दिखती है। उन्हें मामले की सीबीआई जांच से इंकार नहीं ,मगर डर है कि कहीं इस केस का भी हश्र नोएडा की आरूषि जैसा न हो जाए। अब इतने बड़े सूबे की मालकिन को कौन समझाए कि आरूषि के आगे एक गरीब चौकीदार सोनम की क्या बिसात? दोनों की हैसियत,कैफियत,परिवेश,परिस्थितियां और अपराध की प्रवृत्ति अर्श के आगे फर्श जैसी है। माया की फिक्र जीते जी फांसी पर झुला दी गई फूल सी बच्ची के गुनहगारों को फांसी पर लटकाने में नहीं। वस्तुत: माया का भय तो फकत इतना है, कि अल्पसंख्यकों के मामले में बेहद नाजुक यूपीए सरकार की सीबीआई कहीं इसी बहाने उन पर कोई सियासी फंदा न फंसा दे। सफेदपोशों की सरपरस्त सियासत के असली चरित्र का यह कोई नया चेहरा नहीं है। माया को इस मसले में राष्ट्रीय मानवाधिकार के दखल पर भी सख्त एतराज है। उन्हें इसमें भी केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार की राजनीतिक चाल दिखती है। अब माया को यह भी कौन बताए कि ऐसे संगीन और संवेदनशील मानवीय मामलों को स्वयं संज्ञान में लेना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का नैतिक कर्तव्य भी है और संवैधानिक अधिकार भी। वस्तुत: यही मानवीय धर्म भी है। बहरहाल, सोनम के सवाल पर यूपी की सियासी सरगर्मियां उफान पर हैं। सोनम के शव के दो पोस्टमार्टम के बाद भी मुद्दों की भूखी कांग्रेस का पेट अभी नहीं भरा है। उसने तीसरे पोस्टमार्टम की मांग उठाकर राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी हैं। भाजपा सीबीआई जांच की जिद पर अड़ी है। मायावती सरकार को लगता है कि उसने घटना के पांच दिन बाद एसपी समेत पूरे थाने को सस्पेंड करके अपने राज्य धर्म का निर्वाह कर दिया है। मामला शांत होते ही चुपचाप बहाली देकर सरकार अपने प्रशासनिक धर्म का भी निर्वाह कर लेगी। ऐसे में अगर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो देश में हर 60 मिनट में बलात्कार की दो वारदातों के सच को स्वीकार करता है तो हैरानी कैसी? आश्चर्य इस बात पर भी नहीं कि महिला अपराधों के मामले में भारत दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश है। 2009 की स्थिति में देश में 10 करोड़ लोग मानव तस्करी में शामिल थे। 30 लाख वेश्याएं थीं, जिनमें से 40 प्रतिशत बच्चे थे।

बुधवार, 15 जून 2011

सरकार की लाड़ली पेट्रोलियम कंपनियां



मनमोहन की अर्थशास्त्री सरकार को चाणक्य के अर्थशास्त्र की कम से कम यह उक्ति तो अंगीकृत करनी ही चाहिए कि राज्य को जनता से कर वैसे ही लेना चाहिए जैसे फूल को बगैर क्षति पहुंचाए मधुमक्खी रसपान करती है,मगर सरकारें हैं कि कर वसूली में आम आदमी का बड़ी ही क्रूरता के साथ खून चूसती हैं। पेट्रोल,डीजल,रसोई गैस और केरोसिन की कीमतों में सबसे ज्यादा हिस्सा टैक्स का होता है। केंद्र हो या राज्य सरकारें बैठे बैठाए करोड़ों का राजस्व कमाती हैं। केन्द्र सरकार साढ़े 7 फीसदी कस्टम ड्यूटी समेत प्रतिलीटर पर 7 प्रकार के कर माध्यमों से 29 रुपए वसूलती हैं,उधर पेट्रो कीमतों की वृद्धि पर प्राय: केंद्र को कोसने वाली राज्य सरकारें भी वैट ,सरचार्ज, सेस और इंट्री टैक्स लेती हैं। पेट्रोल पर देश का सर्वाधिक 28.75 फीसदी वैट मध्यप्रदेश में वसूला जाता है। मध्य प्रदेश सरकार इसी मद में एक फीसदी इंट्री टैक्स भी लेती है। अर्थशास्त्री कहते हैं,इन करों पर सरकार की जरा सी राहत भी आम आदमी के लिए बड़े काम की हो सकती है, लेकिन इसके विपरीत सरकारें जब-तब क्रूड ऑयल की आसमान चूमती कीमतों का खौफ खड़ा कर अपने खजाने भरने के रास्ते बनाती रहती हैं। वस्तुस्थिति तो यह है कि कर की सरकारी नीतियां स्वयं में स्वार्थपूर्ण हैं। जिसकी वजह से पेट्रोलियम पदार्थो के खुदरा मूल्यों की कीमतें बढ़ती हैं। पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के हवाले करने की मजबूरी वास्तव में सिवाय विधवा विलाप के कुछ और नहीं है,अगर मूल्य सरकारी नियंत्रण से बाहर ही हैं, तो पिछले माह मई में पेट्रोल के मूल्यों में अभूतपूर्व इजाफा करने वाली सरकार पांच राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के परिणामों का पूरे 6 माह तक इंतजार कैसे कर पाई? सवाल यह भी है कि नई दिल्ली के मुकाबले पाकिस्तान जैसे दरिद्र देश की राजधानी इस्लामाबाद में प्रति लीटर पेट्रोल 50 फीसदी सस्ता क्यों है? कोलंबो और ढाका में प्रति लीटर पर 17 प्रतिशत । चीन के बीजिंग और अमेरिका के वाशिंगटन की तुलना में नईदिल्ली का पेट्रोल 36 फीसदी मंहगा क्यों है? अगर भूटान के थिंपू और नेपाल के काठमांडू में दाम आसमान पर हैं तो इसकी सिर्फ एक ही वजह है कि इन दोनों देशों का निर्यात नियंत्रण भारतीय तेल कंपनियों के हाथ में है। यह कहना ठीक नहीं कि अंतराष्ट्रीय बाजार की बदौलत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां 450 करोड़ के घाटे पर हैं। यह सही है कि पिछले दो वर्षो के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य आसमान पर थे, लेकिन यह भी सही है कि इसी दौरान ओएनजीसी को 16041 करोड़, गैल को 2814करोड़, इंडियन ऑयल को 2570 करोड़ और ऑयल इंडिया को 2166 करोड़ का लाभ हुआ। विश्व बाजार में पिछले साल जब तेल की कीमतें गिरीं तो इसका लाभ देश के आम उपभोक्ताओं को क्यों नहीं मिला? सरकार को यह समझना चाहिए कि 50 करोड़ भारतीयों की जिंदगी पेट्रोल पर चलती है। अमेरिका के बाद दुनिया में यह दूसरी सबसे बड़ी आबादी है ,जो इसी दम पर रोज कमाती -खाती है। पेट्रोलियम पदार्थो में दर वृद्धि की मार भी इसी बेकसूर आबादी पर पड़ती है। चूंकि डीजल-पेट्रोल वाहन ईंधन हैं ,जो सीधे देश की परिवहन और यातायात को प्रभावित कर अंतत: महंगाई बढ़ाते हैं।

मंगलवार, 14 जून 2011

कांग्रेस: चाल, चेहरा और चरित्र



द सेंटिनरी हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस का पांचवां खंड बाजार में है। इसके संपादक हैं, पुराने कांग्रेसियों में एक वित्त मंत्री दादा प्रणवमुखर्जी। इस पुस्तक को पार्टी के आधिकारिक इतिहास (वर्ष1964-84)की संज्ञा दी गई है। पुस्तक का लब्बोलुआब यह है कि तीस दशक पहले कांग्रेस के मटियामेट के लिए इंदिरा गांधी दोषी थीं और आज कांग्रेस के पिं्रस राहुल गांधी सब कुछ ठीकठाक करने के लिए इन्हीं चुनौतियों से जूझ रहे हैं । तो क्या कांग्रेस सगंठनात्मक सत्ता के शीर्षस्तर पर इस हद तक बदलाव के दौर से गुजर रही है? उधर,अगर रक्षा मंत्री एके एंटनी की मानें तो भ्रष्टाचार और कालेधन के बहाने ही सही देश पारदर्शिता कं्राति की राह पर है और इसे समझने के लिए ना तो कांग्रेस तैयार है और नाही उसकी यूपीए सरकार। सवाल यह भी है कि सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस आखिर किधर जा रही है? उसकी चाल,चहेरे और चरित्र में आए हालिया बदलाव बताते हैं कि अंदर ही अंदर फिलहाल सब कुछ शुभ नहीं है। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र का आलम तो यह है कि यूपीए सरकार हो या फिर स्वयं कांग्रेस परस्पर बयानबाजियों में एकरूपता नहीं है। इनके निहितार्थ भी आपस में खासे गुत्थम गुत्था से लगते हैं। कल तक डील को आतुर जिन केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को बाबा रामदेव के सारे मुद्दे व्यापक जनहित में लग रहे थे ,उन्हीं के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह को बाबा अब ठग नजर आ रहे हैं। सत्याग्रह पर आश्रित जिस भ्रष्टाचार विरोधी नागरिक आंदोलन को सरकार ने इतनी बेरहमी से पीट कर जिस तरह की रेडलाइन दी है, उससे कांग्रेस को कौन सा राजनैतिक फायदा होने जा रहा है? तमिलनाडु में भ्रष्टाचार के खिलाफअभूतपूर्व जनादेश के बाद भी सरकार में डीएमके की भागीदारी आखिर कांग्रेस की आज कौन सी सियासी मजबूरी ह ैइससे देश को आखिर क्या संदेश मिलता है। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि अण्णा हजारे में अगर कांग्रेस को आरएसएस का मुखौटा दिखता है तो फिर कथित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस की सलामती के लिए सर्वधर्म प्रार्थना सभा के अलावा कोईऔर रास्ता नहीं बचता है। कांग्रेस के नेतृत्ववाली हिंसक हो चुकी यूपीए सरकार अगर यह सोच कर डंडे का जोर दिखा रही है कि राष्ट्रविरोधी सांप्रदायिक ताकतें भ्रष्टाचार की आड़ में देश को अस्थिर करना चाह रही हैं तो वह अप्रकट रूप से अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए ही जमीन तैयार कर रही है। देश जानता है कि कांग्रेस की यह भाषा नई नहीं है। सत्तर-अस्सी के दशक में भी कांग्रेस की यही जुबान थी। कहना न होगा कि यह भाषा कुछ-कुछ आपातकालीन है। सच तो यह है कि अंतत: अल्पसंख्यक बोट बैंक के गुणा-गणित में फंसी कांग्रेस के राष्ट्रीय सलाहकार उसे अपने उस मसौदे तक ले गए हैं, जो यूपीए सरकार को सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण विधेयक-2011 जैसे देश तोड़क कानून बनाने की प्रेरणा देता है। कांग्रेस के सलाहकार और रणनीतिकार कुछ भी कहें लेकिन हकीकत तो यह है कि अब वक्त आ गया है ,जब कांग्रेस अपने आंतरिक शुद्धीकरण के लिए आत्ममंथन करे। उसे पार्टी केअंदर और बाहर लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकपक्ष के जनहित की फिक्र करनी चाहिए । इसी में उसका भी हित है।

शनिवार, 11 जून 2011

दब्बू भारत और दबंग अमेरिका


देश की औद्योगिक राजधानी मुंबई में 26/11के आतंकी हमले का असली सूत्रधार तहव्वुर हुसैन राणा अगर संघीय अदालत से बाइज्जत बरी हो गया तो इसमें अकेले अमेरिका का क्या दोष? किसी और पर इल्जाम लगाने से पहले क्या हमें हमारा गिरेबान नहीं देखना चाहिए? बहुत संभव है कि अमेरिका ने इसी बहाने पाकिस्तान को खुश करने के रास्ते तलाशे हों, मगर सवाल है कि राणा को गुनहगार साबित करने के मामले में हमारी सुरक्षा और जांच एजेंसियां अब तक क्या कर रही हैं? पाकिस्तानी मूल के इस अपराधी के खिलाफ भारत सरकार के पास ऐसे क्या प्रमाण हैं कि राणा को मुंबई बम ब्लास्ट पर सजा हो सकती है? जवाब वही सीधा सा है-राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) हमले के डेढ़ साल बाद भी मामले की जांच कर रही है। याद करें,इस घटना में 138 भारतीयों समेत 4 अमेरिकन नागरिक मारे गए थे। गौरतलब है,मुंबई हमले में अमेरिका के सिर्फ चार नागरिक मारे जाते हैं और एक साल के अंदर वहां की संघीय जांच एजेंसी (एफबीआई)इस हमले के दोनों सूत्रधारों डेविड कोल मैन हेडली उर्फ दाउद सैय्यद गिलानी और उसके गुर्गे तहव्वुर हुसैन राणा को शिकागो शहर से गिरफ्तार कर लेती है। और, हम हैं कि इस गंभीर मामले में आज भी अपने ही घाव चाट कर जख्म के सूख जाने का इंतजार कर रहे हैं। कल तक हाफिज सईद और दाउद इब्राहिम के पाकिस्तान स्थित ठिकानों की हवाई तस्वीरें दिखा कर एबटाबाद जैसे अमेरिकन ऑपरेशन का दंभ भरने वाले हमारे सियासी शेख चिल्लियों के पास आज आखिर क्या जवाब है? केंद्र सरकार के आंतरिक सुरक्षा सचिव कहते हैं, मुंबई मामले में राणा की रिहाई से भारत को झटका नहीं लगा है। ऐसा कहना तो शर्मनाक कुटिलता की पराकाष्ठा है,अगर झटका नहीं लगा तो फिर ऐसी किसी सफाई की जरूरत क्या है? दुनिया जानती है कि अमेरिकन कोर्ट से राणा की रिहाई के कारण भारतीय आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन की हवा निकल गई है । कहना न होगा कि इस दुर्भाग्य पूर्ण नौबत के लिए हमारी जांच और सुरक्षा एजेंसियां किसी भी हालत में कम जिम्मेदार नहीं हैं। आंतरिक सुरक्षा सचिव कुछ भी कहें लेकिन इस विफलता का ठीकरा अकेले अमेरिका के सिर पर नहीं फोड़ा जा सकता। वस्तुस्थिति तो यह है कि हम इस मामले में ठीक से अपनी ही पैरवी कर पाने में सक्षम नहीं हैं। एक हकीकत यह भी है कि अहिंसा की आड़ में कायरता हमारा राष्ट्रीय धर्म बन गया है। हमारी केंद्रीय सत्ता शांतिप्रिय सत्याग्रह जैसे घरेलू मामलों में तो बर्बरता की हद तक हिंसक हो सकती है लेकिन वैश्विक मंच पर हम इतने भी आक्रामक नहीं हो सकते कि अपने पक्ष को तथ्यों और तर्को के साथ रख सकें। बेशक, अमेरिका की संघीय अदालत का यह फैसला गले नहीं उतरता। राणा के साथ लश्कर-ए-तयैबा के साथ उसके रिश्ते तो साबित हुए हैं लेकिन ये संबंध भारत नहीं डेनमार्क के मामले में हैं। यह फैसला एक बार फिर से इस तथ्य की पुष्टि करता है कि अमेरिका कम से कम भारत के लिए भरोसेमंद नहीं है। एक बड़ा रक्षा सौदा खो देने के बाद भी अगर लादेन के खात्मे के साथ ही अमेरिका -भारत के इतना करीब आया था तो इसमें उसका ही स्वार्थ था। अमेरिका की पैंतरेबाजी अपनी जगह है। सवाल यह है कि हमारी हैसियत क्या है?

शुक्रवार, 10 जून 2011

ऑनर किलिंग: कानून का क्या काम..




प्यार के फेर में फंसी अपनी बहन की गला काट कर हत्या करने के बाद उसका भाई फरार हो जाता है। बूढ़ी विधवा मां दहाड़ें मार-मार कर रोती है। इस मां की आखिर क्या पीड़ा हो सकती है? बेटी की निर्मम हत्या या फिर उसका हत्यारा बेटा? सच तो यह है कि इनमें से दोनों नहीं। मां की फिक्र उसकी अपनी नितांत निजी है। मां को अब सिर्फ एक ही फिर्क खाए जा रही है कि उसका इकलौता बेटा ही उसके बुढ़ापे में लाठी का सहारा था। हाय,राम ! अब क्या होगा? विलाप करती मां बार-बार कहती है,रही बात बेटी की तो उसे अगर बेटा नहीं मारता तो मैं मार डालती..यूपी के सीतापुर में ऑनर किंलिंग का यह हालिया चेहरा इस मनोवैज्ञानिक सामाजिक समस्या पर कई संगीन सवाल उठाता है। ऐसे ही एक मामले में उत्तर प्रदेश के ही मुरादाबाद में अपनी दो सगी बेटियों को मौत के घाट उतारने वाली हत्यारिन मां को कोर्ट ने ताउम्र कैद की सजा सुनाई तो उसकी चेहरे पर हवाइयां हरगिज नहीं उड़ीं। इज्जत के लिए तीसरे हत्याकांड के मामले में एटा की एक स्पेशल कोर्ट ने जब दस हत्यारों को फांसी की सजा सुनाई तो कातिलों से कदाचित किंचित मात्र भी अपराध जैसा कोई बोध नहीं झलका। दरअसल, पछतावा विहीन यह बर्बर और आदिम मानसिकता बताती है कि कानून बहुत कुछ कर पाने की हालत में नहीं है। एक गैर सरकारी सव्रेक्षण कहता है कि झूठी आन-बान और शान के लिए देश में सालाना साढ़े 6 सौ से भी ज्यादा युवक-युवतियों को कुर्बान कर दिया जाता है। इन मामलों में वे आंकड़े भी शामिल हैं, जिनमें सगोत्रीय जोड़े होने के बाद भी उन्हें सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि उनकी शादी मां-बाप की मर्जी के खिलाफ थी। कल तक ऑनर किंलिग के सवाल को राज्यों का विषय बताने वाली यूपीए की केंद्र सरकार अब इस मामले में आनन-फानन में मानसूत्र के दौरान कानून लाने वाली है। सवाल यह है कि कानून आखिर क्या कर लेगा? ऐसे अपराधों पर दंड तय करने के तमाम पर्याप्त कानून पहले से मौजूद हैं। वस्तुत:यह विशुद्ध सामाजिक मनोवैज्ञानिक समस्या है। इसकी जड़ें संस्कृति और संस्कारों से परंपरागत तौर पर गहरे से जुड़ी हुई हैं। जाहिर है, इस संकट का निदान भी यहीं ,कहीं इसी के इर्द-गिर्द देखना होगा। यह कोई राजनैतिक विषय नहीं है, अलबत्ता अहम बात यह है कि ऑनर किंलिंग जैसे अपराधों की जड़ में बैठी खाप पंचायतें स्थानीय स्तर पर अपना जोरदार राजनैतिक रसूख रखती हैं। थोक वोट बैंक के प्रबंधन और उसके धुव्रीकरण में भी फतवों के माफिक इनके फरमान चलते हैं। समनांतर सत्ता का पर्याय ये पंचायतें कितनी ताकतवर हैं ,इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वे न केवल बर्बर वारदातों को कानूनी मान्यता दिलाने का एलानिया समर्थन करती हैं अपितु अपनी नाक के सवाल पर इसके खिलाफ निहित संवैधानिक प्रावधानों को भी आंख दिखाने का हौसला रखती हैं। क्या केंद्रीय सत्ता झूठे मान के लिए हत्या जैसी जघन्य वारदातों की पोषक खाप पंचायतों पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान कर पाएगी? और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो उसे यूथ बोट बैंक को भरमाने के कानून बनाने के नाम पर राजनीति करने की जरूरत नहीं है।

गुरुवार, 9 जून 2011

राजनीति की मैली गंगा


राम की मैली गंगा। असल में आखिर, किसकी गंगा? स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस की या फिर कथित धुर धर्माध भाजपा की..अब गंगा पर हक हथियाने की होड़ तकरीबन तय है। घोर कलयुग का कमाल देखिए , पापियों के पाप धोने से पतित हुई पुण्य सलिला गंगा को पवित्रता की गारंटी भी अब गंदली राजनीति ही देगी। गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारने के लिए कभी भागीरथ ने भी इतना जोर न मारा होगा,जितना जोर अब गंगा के लिए यूपी के आसन्न चुनावी दंगल में लगने वाला है। उत्तरप्रदेश में विधान सभा चुनाव से ठीक थोड़ा पहले सियासी तौर पर निहत्थी भाजपा ने वहां जमीन खोजती कांग्रेस के नहले पर जिस तरह से दहला मारा है,इससे फिलवक्त यही संकेत मिलते हैं। कहना न होगा कि कल तक एक अदद मुद्दे की भूखी भाजपा अब कांग्रेस के एक बड़े सुनियोजित चुनावी हथियार को हथियाने में सरसरी तौर पर कामयाब रही है। केंद्र में सत्तारूढ़ यह वही कांग्रेस है, जिसने नवंबर 2008 में सात राज्यों के साथ-साथ लोकसभा के प्रस्तावित आम चुनावों के दौरान गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा देने के मसले को कैश कराने की रणनीति अपनाई थी। तब सत्ताधारी कांग्रेस ने गंगा की आड़ में एक तीर से तीन निशाने साधे थे। बहुसंख्यक हिंदू वोट बैंक का दिल जीतने, हिंदूवादी नेताओं का जनाधार बढ़ाने में मददगार गंगा के आंदोलनकारी समाजसेवी संगठनों का दम तोड़ने और यूपी की सीएम मायावती की बहुउद्देश्यीय गंगा एक्सप्रेस की हवा निकालने में यह कथित धर्मनिरपेक्ष दल कितना कामयाब रहा, यह तय कर पाना तो मुमकिन नहीं । मगर इतना तय है कि सरकारी वायदे के तीन वर्ष बाद भी केंद्रीय गंगा नदी प्राधिकरण का अपना कोई वजूद नही है। देश ने इसकी कभी कोई गतिविधि नहीं देखी है। दरअसल वोट की राजनीति के लिए देश के किसी भी सियासीदल का यही असली चरित्र है। गंगा पर राजनीति की एक और रणनीति एक बार फिर अपनी भूमिका में है। लाखों लाख आस्थाओं की प्रतीक पवित्र नदी गंगा सदियों से भारत के मान सम्मान और स्वाभिमान का सवाल रही है, मगर बावजूद इसके अगर 1985 में तबके प्रधानमंत्री राजीव गांधी के गंगा एक्शन प्लान को बतौर अपवाद छोड़ दें तो इसके बाद गंगा की अस्मिता और अस्तिव के लिए फिर कभी कोई सरकारी सक्रियता नहीं दिखी । अलबत्ता इसके सियासीकरण की कोशिशें प्राय: होती रही हैं। वस्तुत:गंगा का सतही सियासत से कोई नाता नहीं है। कोई नदी यूं ही मां नहीं हो जाती! इसके लिए अगाध समर्पण और निर्बाध समग्र सेवा भाव चाहिए। दल-दिल बांटते हैं। गंगा इंसानी सीमाओं को तोड़कर अंतरदेशीय हो जाती है। वह सिर्फ भारत के हर 10 में से 4 लोगों का पोषण नहीं करती अपितु दुनिया के 1/8 आबादी के पालन की परवाह भी उसकी अपनी है, लेकिन देश के सियासतदारों की गंगा के प्रति नीयत कभी ठीक नहीं रही। सरकारी नीतियां बताती हैं कि इस देश में गंगा की अब यही नियति है। कोई गंगा से भी तो पूंछे कि आखिर वह चाहती क्या है? वर्ना ,अगर लोग यही चाहते हैं कि पतितों की इस धरती से अब गंगा को विदा हो जाना चाहिए तो गंगा को भी इससे कोई गुरेज नही है। एक अध्ययन की मानें तो डेढ़ दशक के अंदर गंगा सूख जाएगी। गंगा शायद भी रहे ,लेकिन गंगा वस्तुत: गंगा नहीं रह जाएगी..