बुधवार, 8 जून 2011

उमा की गंगा बनाम शिव की नर्मदा



साधना से संकल्प कैसे फलीभूत होते हैं? राजा भगीरथ के तपोबल से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण की एक पौराणिक कथा कमोबेश ऐसी ही कहानी है। अहंकार से भरी वेगवती गंगा को आखिर संभाले तो संभाले कौन? प्रचंड वेग को संभालने की शक्ति शिव के सिवाय किसी और में नहीं थी। अब, अगर सात साल के कठिन सरकारी श्रम से अटल-उमा संकल्प को उपकृत करती नर्मदा सत्तर किलोमीटर का लंबा सफर तय कर राजधानी पहुंची है ,तो उसकी एक-एक बूंद को सहेजने का सवाल सबसे बड़ी चुनौती है। तब, गंगा को संभालने के लिए शिव-शक्ति सामने थी और अब नर्मदा को सहेजने का सारा दारोमदार शिव-सत्ता पर है। यह भी एक इत्तफाक ही है कि बजरिए उमा जहां गंगा भाजपा का नया सियासी मुद्दा है । वहीं राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए प्रदूषण से पस्त ,पतित पावनी नर्मदा एक बड़ी चुनौती है। प्रदेश के 16 जिलों में सौ से भी ज्यादा सरकारी नालों की बदौलत नर्मदा का पावित्र जल आज पीना और नहाना तो दूर आचमन के लायक भी नहीं बचा है। इससे पहले फौरी तौर पर सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि राजधानी में नर्मदा जल को सरकारी अमला आखिर कैसे संभाले और सहेजेगा? तकरीबन 339 सौ करोड़ के नर्मदा प्रोजेक्ट की कामयाबी सिर्फ इस बात पर निर्भर है कि पानी का ज्यादा से अपव्यय रोका जाए। वर्ना, करोड़ों के कोलार प्रोजेक्ट की नाकामी की कहानी सब के सामने है। सरकारी आंकड़ों पर ही यकीन करें तो राजधानी की 285 वर्ग किलोमीटर की नगर सीमा परिधि में 6 हजार से भी ज्यादा ऐसे छोटे-बड़े लीकेज हैं ,जिनसे रोजाना 6 करोड़ लीटर पीने लायक पानी बेकार में बह जाता है। ऐसे ही एक अनुमान के मुताबिक इन लीकेज के मेंटीनेंस में सालाना डेढ़ करोड़ रूपए खर्च किए जाते हैं। राजधानी के जिस पुराने भोपाल इलाके में भीषण जलसंकट है, उस क्षेत्र में पानी कीआपूर्ति का नेटवर्क भरोसे के काबिल नहीं है। पाइप लाइनें सौ साल पुरानी हैं। राजधानी को रोज 362 एमएलडी पानी की आवश्यकता होती है। सब जानते हैं कि मांग के मुकाबले उपलब्धता एवं आपूर्ति में भारी अंतर वस्तुत: जल संरक्षण और उसके वितरण में कुप्रबंधन का नतीजा है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि असलियत जब यह है तो ऐसे में नर्मदा प्रोजेक्ट से आखिर क्या उम्मीद की जा सकती है? एक और सरकारी दावे के अनुसार अकेले नर्मदा प्रोजेक्ट से प्रतिदिन185 एमएलडी जलापूर्ति संभव है, लेकिन आशंका है कि कुल आपूर्ति की तकरीबन 25 फीसदी जलराशि सप्लाई की पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के कारण बेकार चली जाएगी। हालांकि, नर्मदा प्रोजेक्ट के तहत ही पुराने भोपाल में 415 करोड़ की शुरूआती लागत से 23 सौ किलोमीटर लंबी पाइप नई पाइप बिछाने की भी योजना है, लेकिन यह प्लान फिलहाल दूर की कौड़ी है। इसके अमल में कम से कम 6 साल लगेंगे। जाहिर है, नर्मदा जल का लाभ फिलहाल जरूरतमंदों को मिलने के उम्मीद कम ही है। राजधानी में पानी का असमान वितरण भी एक बड़ी समस्या है। कहीं पानी ही पानी है तो कहीं बूंद-बूंद जल के लिए लोग मोहताज हैं। अब देखना यह है कि राम-रोटी,गौ और अब गंगा में जनाधार ढूंढती भाजपा की सत्ताधारी सरकार आखिर नर्मदा उद्धार के लिए क्या कदम उठाती है?

मंगलवार, 7 जून 2011

दहशतगर्दो के निशाने पर देश का दिल



यह कहना कितना दुखद और शर्मनाक है कि इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) और प्रतिबंधित स्टूडेंट इस्लॉमिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के 8 खूंखार आतंकवादियों की गिरफ्तारी अंतत: एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस)के एक और जवान की शहादत का नतीजा है। हाल ही में रतलाम में सिमी के साथ मुठभेड़ के दौरान एक तरह से निहत्थी एटीएस टीम जिस तरह से लाचार दिखी,इससे इस बात का अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादी गतिविधियों के मुकाबले मध्यप्रदेश पुलिस आखिर कितनी सतर्क और सशक्त है। एटीएस अगर अपना एक और साथी खोने के बाद हरकत में नहीं आती तो शायद देश के ये दुश्मन जाने कब और कहां खून की होली खेलकर ठहाका लगा रहे होते? इस बड़ी कामयाबी पर पुलिस के खुफिया तंत्र को खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। अलबत्ता यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि रतलाम में मुठभेड़ एक मामूली सी मुखबिरी का नतीजा थी,अगर ऐसा नहीं होता तो एटीएस का ऑपरेशन किन्ही सटोरियों की गिरफ्तारी जैसा नहीं होता और..और,एक शहादत का कलंक माथे पर नहीं लगता। प्लानिंग कुछ ऐसी होती जैसा एक्शन जबलपुर से भोपाल के बीच हुआ, लेकिन इस कामयाबी के तार भी रतलाम से ही जुड़े हुए हैं। इसे इत्तफाक ही कहें कि एक लाख का इनामी फहरत उर्फ खालिद एटीएस के हत्थे चढ़ गया और इसी की निशानदेही पर इंडियन मुजाहिदीन का मास्टर माइंड अब अबू फजल भी गिरफ्त में है। अबू वह शख्स है ,जिसने सिमी चीफ सफदर नागौरी की गिरफ्तारी के बाद मध्यप्रदेश में उसके आपराधिक सत्ता संभाल रखी थी। उधर, फैजल पाकिस्तान में बैठे इंडियन मुजाहिदीन के टॉप लीडर रियाज भटकल और इकबाल भटकल के संपर्क में था और इधर,फहरत भी अबू से लगातार संपर्क बनाए हुए था। आतंकी गतिविधियों के प्रति जहां तक प्रदेश पुलिस की सक्रियता का सवाल है, तो एटीएस के एक और जवान का कातिल यह वही फहरत है, जो एक साल पहले इंदौर की परदेसीपुरा पुलिस की चूक का लाभ लेकर जमानत पर भाग निकला था । इस समूचे घटनाक्रम से यह बात तो साफ हो गई है कि देश का दिल मध्यप्रदेश नए सिरे से दहशतगर्दो के निशाने पर है। खासकर इंडियन मुजाहिदीन की जड़ों को मजबूत करने के लिए प्रतिबंधित सिमी का नेटवर्क किसी कैरियर की तरह काम करता है। सवाल यह है कि वे कौन सी ताकते हैं ,जो स्टूडेंट इस्लॉमिक मूवमेंट ऑफ इंडिया का स्थानीय स्तर पर पोषण करती हैं ? आखिर आस्तीन के इन सांपों को कब चिहिंत किया जाएगा? वे कौन से कारण हैं,जो आईएम या सिमी के लिए मध्यप्रदेश को सेफ जोन बनाते हैं। यह कहना ठीक नहीं कि प्रदेश में सिमी नए सिरे से अपना नेटवर्क बना रही है। इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि राज्य में आईएम और सिमी का मजबूत गठबंधन नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए सक्रिय है और उसे सिर्फ मौके की तलाश है। जबलपुर और भोपाल में सक्रिय आतंकियों की गिरफ्तारी बताती है कि भ्रष्टाचार से आंदोलित देश के इस नाजुक मौके का आतंकी फायदा उठाने की फिराक में थे। सवाल यह भी है कि आखिर इसके लिए मध्यप्रदेश को ही क्यों चुना गया था?

सोमवार, 6 जून 2011

हिंसक सरकार से सिर्फ एक सवाल




पूरा देश दंग है। गांधी के देश में कथित गांधीवादी सरकार के हाथों एक सत्याग्रह की ऐसी त्रसदी। कोई जनतांत्रिक सत्ता इतनी निर्मम और निरंकुश भी हो सकती है,सहसा यकीन नहीं होता। हिंसक होती भीड़ तो देश ने कई मर्तबा देखी है,लेकिन बेवजह यूं हिंसक हुई सरकार के बर्बर व्यवहार से देश पहली बार दो-चार हुआ है। क्या किसी भी सरकार को यूं कानून हाथ में लेने का अधिकार है? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि शांतिप्रिय सत्याग्रह कर रहे बाबा और उनके समर्थकों पर सीधे दमन की आक्रामक कार्रवाई के पीछे सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी? असलियत तो यह है कि सरकार के पास भी इस सवाल का कोई तार्किक जवाब नहीं है। जवाब में सराकर के बड़बोले सिर्फ कुतर्क कर रहे हैं। बचाव में उनके पास महज बेशर्मी भरे गैर जिम्मेदाराना जवाब ही हो सकते हैं। असल में गजब के माइंड और अद्भुत ‘मॉस मैनेजमेंट’ देखकर सरकार का संयम टूट गया। बाबा के समर्थन में भीड़ देखकर भीतर से भयभीत यूपीए सरकार स्वयं में ही चकरा गई। सरकार के सलाहकारों को लगा कि नागरिक आंदोलन की आड़ में उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अपना जनाधार मजबूत कर रहें हैं। कांग्रेस के नेतृत्तववाली यूपीए सरकार को इस भीड़ के आगे भाजपा और पीछे से आरएसएस के भूत क्या दिखे कि वह चोरों के माफिक देर रात सीधे लाठी,गोली और बंदूक पर उतर आई। सरकार चाहती तो फौरी तौर पर सीधे(नाटकीय नहीं,जैसा उसने किया)समझौते करके बाबा के दबाव की हवा निकाल सकती थी। नासमझी में ही सही अण्णा हजारे की हजार समझाइश के बाद भी बाबा ने स्वयं सरकार के लिए सारे रास्ते खोल कर रखे थे, लेकिन सरकार ने अण्णा की तरह बाबा रामदेव को मुद्दों से भटकाने के बजाय भड़काने की रणनीति अपनाई। बाबा की तमाम कमजोर कड़ियों से इंकार नहीं लेकिन, बौखलाई सरकार ने बर्बर फैसला लेने से पहले इस बात की भी फिक्र नहीं कि उसके इस कदम से देश में हिंसा भड़क सकती है। आखिर संविधान का कौन सा प्रावधान किसी भी सरकार को देश में आग लगाने का अधिकार देता है? कहना न होगा कि रामदेव को लेकर सियासत की सिर्फ एक ही फिर्क रही है कि वह राजनीति क्यों कर रहे हैं? क्या इस लोकतांत्रिक देश में किसी अराजनैतिक भारतीय नागरिक को कानून के दायरे में रह कर राष्ट्रहित से जुड़े सामाजिक सरोकार के राजनैतिक सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है? क्या सारा ठेका सफेदपोश सियासतदारों की ही थाती है? बाबा हों या अण्णा आज अगर इन दोनों को भारी समर्थन मिल रहा है तो इसका सिर्फ एक ही कारण है कि राजनीति से आमआदमी का भरोसा सियासतदारों की ऐसी ही हरकतों के कारण उठता जा रहा है। सत्याग्रह पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की भी भूमिका आदतन बहुत आशाजनक नहीं रही है। खासकर ऐसे मौकों पर अक्सर मसालों की भूखी मीडिया कभी भी किसी के भी बयान को जिस तरह से कंट्रोवर्सी में बदलती रही है,इससे वह छल-कपट की राजनीति में माहिर सियासत के तमाम बड़बोलों का बेवजह पोषण तो करती ही है,इससे वह किसी और का नहीं अपितु अपने ही भरोसे का भी खून करती है।

शनिवार, 4 जून 2011

शर्मनाक खुश खबरी आप भी सुनिए!


भारत का आधारभूत सामाजिक ढांचा आर्थिक मोर्चे पर इतना असंतुलित, अराजक,अस्थिर और जजर्र भी हो सकता है। सहसा,यकीन नहीं होता । दुनिया के ताकतवर देशों में कथित तौर पर तकरीबन शुमार हो चुके इस देश की असली तस्वीर तब तक नहीं दिखेगी जब तक कि हम हिंदुस्तान के अंदर मौजूद मुट्ठी भर इंडिया और भव्य भारत को अलग-अलग, मगर एक साथ नहीं देखेंगे। इंडिया में अमीर अर्श पर हैं तो भारत के गरीब फर्श पर। आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में वैश्विक मंच पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए हमारी इससे बड़ी दुखभरी शर्मनाक खुशखबरी और क्या हो सकती है कि दक्षिण एशिया में हम चीन के मुकाबले 4 फीसदी से भी ज्यादा बड़े उभरते हुए बाजार हैं। एक ऐसा बाजार जहां मूल्यों के अवमूल्यन की शर्त पर हर चीज बिकाऊ है। जहां नैतिक मूल्यों का भले ही कोई मोल न हो लेकिन अनैतिकता हर कीमत पर अनमोल है। मनमानी मुनाफे की सौदेबाजी का एक तमाशा यह भी है जहां इंडिया दुनिया में सबसे तेजी के साथ अमीर हो रहा चौथा सबसे बड़ा देश है ,वहीं हिंदुस्तान में एक ऐसा दरिद्र और निर्धन भारत भी है, जहां का हर चौथा इंसान भूखा और भिखारी है। भारत में 6 करोड़ से भी ज्यादा ऐसे बदनसीब हैं जिन्हें, आज भी दो जून की रोटी नसीब नहीं हैं। अतुल्य भारत की यह स्वेत-श्याम तस्वीर वस्तुत: मल्टीकलर इंडिया की शान में मखमली जाजम पर टाट के किसी टुकड़े के मानिंद है। यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा के इंडिया आगमन का अवसर हो या फिर कॉमन वेल्थ गेम का आयोजन राजधानी दिल्ली से भारतीय भिखारी ढूढ-ढूढ कर खदेड़े जाते हैं। खासकर 60 हजार से भी ज्यादा वो स्ट्रीट चिल्ड्रेन जो हमें हमारी औकात बताते हैं,पुलिसिया बूटों की खुराक पाते हैं। हकीकत तो यही है कि दौलत में अपना सिक्का चलाने के बाद भी हम गरीबी,भुखमरी,बेकारी, बीमारी, असुरक्षा और अशिक्षा के बीच जमीनी स्तर पर थके-हारे और टूटे हुए हैं। भीतर से खोखले भारत की इंडिया शाइनिंग और फील्ड गुड मनबहलाने का बेहतर बहाना हो सकते हैं मगर हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि दुनिया के दिखाने की होड़ में हम आखिर कब तक हकीकत से मुंह चुराते रहेंगे? दुनिया के आइने पर तरक्की के हमारे ये तमाम तमगे दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुनियोजित साजिश का नतीजा हैं। यह भी समझना होगा कि दिखावे की इस दुनिया में हम सबसे पहले अपने भीतर देखने की कोशिश करें । इन प्रायोजित अनुसंधानों के लिए खूबसूरत आंकड़े बनाने की कवायद के बजाय अगर हमारी सरकारें आम आदमी को सड़क, बिजली,पानी,शिक्षा और सुंदर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की गारंटी दे सकें तो उनका इस देश पर बड़ा उपकार होगा। भय-भूख और भ्रष्टाचार मुक्त भारत ही हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। दुनिया हमें कुछ भी समङो हमारी घरेलू स्थिति बड़ी नाजुक है। ये वही सामाजिक शोषण और आर्थिक असमानताएं हैं जो देश के अंदर नक्सलवाद की जड़ों को खाद पानी दे रही हैं। अत: आवश्यक है कि वक्त रहते हमारी सरकारों को आंकड़ों की बाजीगरी से बाज आना चाहिए । अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम दाना-पानी के लिए जानलेवा खूनी संघर्षो से जूझ रहे होंगे।

शुक्रवार, 3 जून 2011

बच के रहना रे, बाबा..


देश में भारी भ्रष्टाचार के सवाल पर पहले मशहूर समाजसेवी अण्णा हजारे और अब नामवर योगगुरू बाबा रामदेव..स्वछंद सियासी आचरण से अराजक हो रहे बहुमत को आज बेशक एक लोक नायक की तलाश है।
बेसब्री इस कदर है कि कोई अण्णा हजारे को छोटे गांधी के रूप में देखता है, तो किसी को बाबा रामदेव में दूसरे गांधी के दर्शन होते हैं। सवाल यह है कि इन दोनों में से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है? अभी न सही लेकिन कल यह सबसे बड़ा सवाल सामने आकर चट्टान की तरह खड़ा होने वाला है। कल तक विपरीत धुव्र रहे दोनों आज अगर साथ-साथ हैं ,तो यह सियासी दगाबाजी की देन है। वर्ना,अण्णा हों या बाबा कुछ अपावादों को छोड़ दें तो दोनों में दूर-दूर तक कोई खास समानता नहीं दिखती है। बात बहुत पुरानी नहीं है,जब जतंर-मंतर से चला अण्णा का जादू पूरे देश के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था तब अनशन के मंच पर बाबा रामदेव के लिए बमुश्किल जगह बनानी पड़ रही थी और आज वही अण्णा अंतत: बाबा की शरण में शीर्षासन लगाकर बैठे हैं। बाबा के मुकाबले अण्णा में यही बुनियादी फर्क है। अण्णा के पास अगर कुछ पाने को नहीं है तो कुछ खोने को भी नहीं है। उनका कोई फाइनेंसर नहीं है। उनके पास आत्मबल और जनशक्ति है। वह जेट पर नहीं उड़ते। उनके पांडाल भी एयरकूल्ड नहीं हैं । इसके विपरीत बाबा रामदेव के अब सिर्फ भगवाधारी स्वामी नहीं हैं। वह एक बहुत बड़े व्यावसायिक साम्राज्य के स्वामी भी हैं। जहां सत्ता का दबाव चलता है। अप्रकट रूप से बाबा के पीछे उनके उन पूंजी निवेशकों का भी दबाव हो सकता है, जिन्होंने बाबा के वैश्विीकरण में बड़ी भूमिका निभाई है। अण्णा समग्र भ्रष्टाचार को फोकस करते हैं मगर बाबा का ध्यान अकेले कालेधन पर केंद्रित है। दोनों के एजेंडे का यह एक बड़ा फर्क है। इसके अपने मंतव्य और निहितार्थ हैं। बाबा आगे चलकर किस करवट बैठेंगे,अभी कुछ भी कह पाना जल्दबाजी होगी। इस बीच बाबा जिस तरह से जल्दी-जल्दी पलटें हैं, यह शक और भी गहराया है। अगर बाबा रामदेव की अपनी व्यावसायिक मजबूरियां हैं तो उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल के लिए खड़े हुए इस देशव्यापी आंदोलन की राह से हट जाना चाहिए। योगगुरू के रूप में बाबा रामदेव के खुबसूरत चेहरा हो सकते हैं लेकिन वह सिसायत के कोई खांटी खिलाड़ी नहीं हैं। सिविल सोसायटी के एक सर्वमान्य प्रतिनिधि बनकर उभरे अण्णा हजारे एंड कंपनी की अगर आज मनमोहनी सरकार ने यह दरुगति कर दी है तो इसकी एक बड़ी वजह अण्णा में राजनीतिक परिपक्वता का अभाव ही है। अण्णा अगर बाबा की शरण में हैं तो सिर्फ इसलिए कि वह सरकारी चालों को समझ चुके हैं। लोकपाल के सवाल पर सरकार की रणनीति शुरू से ही साफ थी। अण्णा अनशन के चौथे ही दिन सरकार ने जिस तरह से घुटने टेके थे दाल में काले की आशंका उभर आई थी। रामदेव के मामले में सरकार एक बार फिर से वैसी ही नाटकीय भूमिका में है। एयरपोर्ट पर बाबा की आत्मिक अगवानी के लिए पहुंचे आला दज्रे के केंद्रीय मंत्रियों की मंशा बताती है कि अब दाल में कु छ नहीं बहुत कुछ काला है। क्या बाबा रामदेव अण्णा की इस हालत से सबक लेंगे?

गुरुवार, 2 जून 2011

राजधानी में नर्मदा के राजनैतिक निहितार्थ



शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर राजधानी में मां नर्मदा के अवतरण का यह भी एक इत्तफाक ही है कि उमा का एक सियासी संकल्प पूरे 8 साल बाद अंतत: शिव सरकार में फलीभूत होने को है। जाहिर है, रामनामी भाजपा सरकार राजधानी में पूजा के थाल सजाकर नमामि देवि नर्मदे का स्तुति गान को आतुर है। हो भी क्यों न,12 वर्ष पहले तबके प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने एक चुनावी सभा के दौरान नर्मदा जल भोपाल लाने के सियासी संकल्प का एलान किया था । 2003 के विधान सभा चुनाव के दौरान यह संकल्प भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल था। भाजपा ही नहीं समय-समय पर कांग्रेस भी इस मुद्दे पर राजनैतिक परचम फहराती रही है, लेकिन सवाल यह है कि सियासतदारों के इन भागरथी प्रयासों का जनहित से आखिर कितना नाता है ? बूंद-बूंद जल संकट को मोहताज झीलों की नगरी भोपाल की एक बड़ी आबादी को भरमाने के लिए कांग्रेस सरकार ने करोड़ों के बजटवाली कोलार पेयजल परियोजना पेश की थी । अब नर्मदा जल से प्यास बुझाने के दावे हैं। तकरीबन 339 सौ करोड़ के भारी भरकम बजटवाली यह परियोजना कोलार की तरह नाकाम नहीं होगी,आखिर इसकी क्या गारंटी है? क्या यह सच नहीं कि राजधानी के भूमिगत जल स्त्रोत आज भी अपार जलराशि से लबालब हैं,जरूरत सिर्फ जल भंडारण ,संरक्षण और उसके वितरण का प्रबंधन किए जाने की है। विशेषज्ञ, कभी भी नर्मदा जल को भोपाल लाने के पक्ष में नहीं रहे हैं। जल संकट के स्थाई समाधान की यह कवायद वस्तुत: लाखों-लाख आस्थाओं की प्रतीक पुण्य सलिला नर्मदा के राजनीतिकरण की रही है। वर्ना, आज मध्यप्रदेश में ही राज्य की यह जीवन रेखा स्वयं जिंदगी और मौत से जूझ रही है। प्रदेश के 16 जिलों में प्राणलेवा प्रदूषण से कलप रही नर्मदा की इस हालत के लिए कोई और नहीं इसी भाजपा सरकार के अधीन नगरीय निकायों के लगभग 102 से भी ज्यादा छोटे-बड़े नाले जिम्मेदार हैं ,लेकिन सरकारी अमला नर्मदा के आसपास अभी तक सीवरेज सिस्टम तक नहीं बना पाया है। सरकारी अनदेखी का आलम तो यह है कि जबलपुर में 12,होशंगाबाद में 29 और मंडला जैसे बड़े शहर में 16 गंदे नाले अफसरशाही की नाक के नीचे नर्मदा को मैला कर रहे हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तीन साल साल के बायोमैपिंग सव्रे के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि मध्यप्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा का जल पीना तो दूर नहाने लायक भी नहीं रह गया है। जलस्तर सी ग्रेड तक पहुंच गया है। गंगा की तरह नर्मदा में जल को शुद्ध रखने के स्वाभाविक प्राकृतिक तत्व नहीं होते हैं। भारतीय मानक संस्थान के मुताबिक जल मे पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 तक होनी चाहिए ,लेकिन और तो और नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में ही पीएच मान 9.0 के स्तर से ऊपर है। नर्मदा की जयकार और उसकी महिमा मंडित करने से ज्यादा जरूरत उसे प्रदूषण से मुक्त करने की है। आस्था के दिखावटी कर्मकांडों से उसे और प्रदूषित करने की जरूरत नहीं है। जल संकट की आड़ में वोट और नोट के पुण्य लाभ की प्रत्याशा में नर्मदा की दुर्गति का खेल अब खत्म होना चाहिए। अन्यथा यह पाप बहुत ही महंगा पड़ेगा । क्योंकि, अगर मां रूठी तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। कभी नहीं..

बुधवार, 1 जून 2011

बाल संरक्षण : बातें हैं बातों का क्या



स्वानों को मिलता दूध यहां,भूखे बच्चे अकुलाते हैं.. राष्ट्रकवि रामधानी सिंह दिनकर की आवाज आज भी तल्ख और ताजा है। इस कालजयी सच के साथ देश आज बाल संरक्षण दिवस मना रहा है, मगर इस परंपरागत आयोजन के मायने क्या हैं? सिर्फ उतने ही जितने हर सरकारी कथित सामाजिक सरोकार के होते हैं। बच्चों के प्रति भारतीय समाज की मानसिकता की असली तस्वीर हमें 15वीं जनसंख्या के शुरुआती आंकड़ें पहले ही दिखा चुके हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में बच्चों के लिंगानुपात में (927 से घटकर 914 )निचली दज्रे की इतनी गिरावट पहली बार देखी गई है। देश में एक दशक पहले कुल जनसंख्या का करीब 16 फीसदी बच्चे थे, लेकिन चालू साल की स्थिति में ये कम होकर करीब 13 फीसदी रह गए हैं। बच्चों में 3 प्रतिशत की चिंताजनक ऐतिहासिक गिरावट वस्तुत: भारत में घटती उर्वरकता की ओर खतरनाक इशारा करती है। इतना ही नहीं ये आंकड़े लिंगानुपात से जुड़ी हमारी सरकारी नीतियों की भी नए सिरे से अविलंब समीक्षा की चेतावनी देते हैं, लेकिन हम और हमारी सरकारें अंतत: बाल संरक्षण के सवाल पर आयोजित सालाना जलसों में सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करके बात खत्म कर देते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण कहता है, देश में तीन साल से कम उम्र के 46 फीसदी से भी ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इस मामले में एक दशक के दौरान सिर्फ एक प्रतिशत की कमी आई है। मध्यप्रदेश की हालत तो और भी खराब है। सेंटर फार बजट गवेर्नेस एंड अकाउंट बिलिटी की मानें तो प्रदेश सरकार बच्चों के स्वास्थ्य मद में जीडीपी का केवल 0.1प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करती है। नेशनल क्र ाइम रिकार्ड ब्यूरो के दावे के मुताबिक देश म ेएक दशक के दौरान ही बाल अपराधों में ढाई गुना इजाफा हुआ है। कुल अपराधों के मुकाबले बाल अपराधों की दर 2.1 प्रतिशत है। और तो और सीएसीएल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 से 80 लाख बाल श्रमिक हैं। जनगणना के ताजा आंकड़े गर्भ में ही कन्या कत्ल की भी गवाही देते हैं। बीस साल में एक करोड़ से भी ज्यादा भ्रूण हत्याएं दर्ज की गई है। आंकड़ों की यह बानगी पत्थर की लकीर न सही, लेकिन सच के इर्दगिर्द एक भयावह और शर्मनाक तस्वीर तो बनाते ही है। यह कितना दुखद है कि खेलने-खाने और पढ़ने की मासूम सी उम्र में बच्चे दो जून की रोटी के लिए रोज खपने-खटने को मजबूर हैं। बच्चों के यूं दर-बदर होते,तार-तार होते सपनों और लुटते-पिटते बचपन के लिए अक्सर उनके वो मां-बाप ही जिम्मेदार होते हैं, जो उन्हें इस दुनिया में लाकर अकेला छोड़ देते हैं । इसके लिए हमारी सरकारें भी कम जिम्मेदार नहीं हैं ,जो गरीबी निर्मूूलन के नाम पर सत्ता का सुख भोगती हैं । मगर बावजूद इसके बेशर्मी देखिए,भारत सरकार के पास निर्विवाद रूप से देश की गरीब आबादी के वास्तविक आंकड़े तक नहीं हैं। कहना न होगा कि बहुसंख्यक बच्चों की इस दरुगति के लिए बुनियादी तौर पर गरीबी ही दोषी है। तेजी के साथ बदले सामाजिक परिवेश के बीच टूटते संयुक्त परिवारों ने भी अंतत: बच्चों पर ही कहर ढाए हैं। बच्चों की खुशहाली के ठेके का ठीकरा अकेले सरकार के सिर पर फोड़ना ठीक नहीं। यह एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक समस्या भी है।