शनिवार, 25 जून 2011

कुत्ते की दुम पाकिस्तान





यह तो होना ही था। कश्मीर मसले पर भारत के खिलाफ प्रधान मंत्री यूसुफ रजा गिलानी के जहर बुङो दो टूक बयान ,दोनों देशों के बीच चल रही विदेश सचिव स्तरीय महत्वपूर्ण आखिरी बैठक के नतीजों का भविष्य पहले ही तय कर चुके थे। दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता के लिहाज से यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण थी ,क्योंकि इसी आधार पर अगले माह होने जा रही भारत-पाक के विदेश मंत्रियों की बैठक का एजेंडा तय होना था। बैठक के ठीक एक दिन पहले पाक अधिकृत कश्मीर पहुंच कर गिलानी का फिर वही विलाप कि कश्मीर मुद्दा पाकिस्तान की जीवन रेखा है और इसी बीच विदेश मंत्री हिना रब्बानी खान की यह तल्खी कि भारत-पाक के बीच सिवाय कश्मीर के कोई और मसला ही नहीं है। इस बात को और भी पुख्ता करता है कि पाकिस्तान अंतत: कुत्ते की ही दुम है। दरअसल ,भारत के साथ दोस्ताने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। लिहाजा भारत को जहां बातचीत के जरिए हर मसले का समाधान दिखता है , वहीं पाक को बातचीत की नजर से किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं दिखती है। वस्तुत: दोनों पक्षों के बीच परस्पर विश्वास की बहाली, मैत्री पूर्ण संबधों का विकास और शांति सुरक्षा की गारंटी बुनियादी मसले हैं। इन्हीं बाधाओं को दूर करने के इरादे से भारत ने मुंबई बम ब्लास्ट के बाद समग्र बातचीत के रास्ते खोले थे। पिछले साल थिंपू में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात के साथ शुरू हुए सकारात्मक बातचीत के दौर से एक बार फिर से यह उम्मीद बंधी थी कि शायद पाकिस्तान अब अपनी हरकतों से बाज आ जाएगा लेकिन लगता नहीं कि अपनी जमीन से भारत के खिलाफ आतंकी अभियान और कश्मीर पर अनाधिकृत स्वामित्व सबसे बड़ा झगड़ा है। उधर,पाकिस्तानी हुक्मरानों को लगता है कि वे अपनी भारत विरोधी नीतियों से ही राजनैतिक रोटियां सेंक कर सत्ता का सुख भोग सकते हैं। यही वजह है कि भारत के मामले में पाकिस्तानी नेतृत्व परंपरागत तौर पर सदैव यथास्थितिवादी रहा है। वहां वोट की राजनीति के लिए भारत का हिंसक और आक्रामक विरोध सियासतदारों का अहम एजेंडा है। पाकिस्तान में कश्मीर के राजनीतिकरण से आम पाकिस्तानी की स्थाई तौर पर यह धारणा बन गई है कि भारत उनका दुश्मन नंबर वन है। दरअसल नापाक इरादों की बदौलत अपने ही पापों से पस्त पाकिस्तान से सिर्फ इतनी ही उम्मीद की जा सकती है? बेहतर हो कि अस्तित्व के लिए अपने आप से ही लड़ रहा यह विफल राष्ट्र कश्मीर की ओर आंख उठाने से पहले अपना ही गिरेबान देखे। पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि इस भीषण संकट से उबरने के लिए उसे क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे, जिसकी हाल फिलहाल गुंजाइश नहीं दिखती है। सेना के आतंकी आचरण,आतंकवादियों की समनांतर सरकार और कठमुल्लेपन पर केंद्रित रूढ़वादी धार्मिक धारणाओं के शिकार पाकिस्तान को यह भी समझना चाहिए कि अगर जिंदा रहना है तो उसे भारत का अनुसरण करना ही होगा। इसके विपरीत पड़ोसी पाकिस्तान के मामले में भारत की ओर से जरूरत समझदारी और सतर्कता के साथ संयमित रहने की है। आशय यह कि पाकिस्तान के साथ भारत की गजब की कूटनीति ही वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

शुक्रवार, 24 जून 2011

लोकपाल का सच


जुलाई के दूसरे हफ्ते में ही संसद का मानसून सत्र बुलाने की प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की मंशा पर फौरी तौर पर सरकार ने भले ही पानी फेर दिया हो लेकिन इससे किसी की भी मुश्किलें आसान होने वाली नहीं हैं। सच्चाई तो यह है कि अकेले मजबूत जन लोकपाल बिल के मसौदे पर असहमति गंभीर चुनौती नहीं है। एक मिनट के लिए अगर उभय पक्षों के बीच सहमति की कोई जादुई राह निकल भी आती है, तो इसके कानूनी पहलू और सियासी बाधाएं इतनी जटिल हैं कि उनसे पार पाना फिलहाल यूपीए जैसी गठबंधन सरकार के लिए संभव नहीं है,क्योंकि इस पर अमल से संविधान का बुनियादी ढांचा प्रभावित होगा। यानि लगभग डेढ़ दर्जन अनुच्छेद संशोधित करने होंगे। एक संपूर्ण स्वायत्त और शक्तिशाली जनलोकपाल के लिए सिविल सोसायटी की ओर से सरकार को 40 बिंदुओं का मसौदा सौंपा गया था, लेकिन सरकार इनमें से महज 11 पर सहमत है। सरकार लोकपाल को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं रखना चाहती है। सरकार चाहती है कि प्रस्तावित 10 सदस्यीय लोकपाल में सर्वाधिक 7 सदस्य राजनैतिक पृष्ठीभूमि से हों। लोकपाल को पदच्युत करने के मामले में भी सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी अपने पास ही सुरक्षित रखना चाहती है। सरकारी मंशा से साफ है कि वह देश में लोकपाल को राज्यों के लोकायुक्त की हैसियत से अलग नहीं कर पा रही है। असहमति के मुद्दों पर कैबिनेट हो या फिर सर्वदलीय सुझाव इस कवायद से भी कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है। वस्तुत: सरकार की तमाम कोशिशें अंतत: इन सबों के ही हितों का पोषण करती हैं। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने के सवाल पर सरकार ने बीच का जो रास्ता निकालने की कोशिश की है, उससे लगता नहीं कि बात आगे बढ़ेगी। पीएम को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कोई नई नहीं है। जैसे आज यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पदेन स्वयं को लोकपाल के दायरे में लाने से सहमत हैं, वैसे ही पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और इससे पहले जनता सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। तीन अलग-अलग प्रधानमंत्रियों की इस मामले में अद्भुत एकरूपता का दूसरा पहलू यह भी है कि कभी पीएम को लोकपाल के दायरे में लाने से सहमत रहे यूपीए सरकार के दूसरे नंबर के प्रभावशाली केद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी आज इस बात से असहमत हैं। यह अचरज एकदम वैसा ही जैसे सिविल सोसायटी के सूत्रधारों में से एक शांति भूषण 1977 की जनता सरकार में कानून मंत्री की हैसियत से प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने के पक्षधरों का नेतृत्व कर रहे थे। आशय यह है कि प्रधानमंत्री की सहमति और सेनापतियों की असहमति के महाशोर के बीच असल मुद्दा गायब करने की कुटिल सियासी चाल कोई नई बात नहीं है। यह इत्तफाक नहीं कि संसद के भीतर सांसदों के आचरण और अफसरशाही को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात उस दौर में चल रही है, जब 90 से ज्यादा सांसदों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं। तकरीबन 180 तो ऐसे सांसद हैं जो किसी न किसी रूप में आपराधिक चारित्र रखते हैं। इतना ही नहीं 375 से ज्यादा आईएएस और 425 से ज्यादा आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच चल रही है।

गुरुवार, 23 जून 2011

मानसून: आया उम्मीदों का मौसम


देश में मानसून का आगाज भले ही झमाझम हो। भारतीय किसान भयभीत और बाजार बेचैन है। यह चिंता नाहक नहीं है। अबकि सामान्य से भी 4 फीसदी कमजोर बारिश की भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की भविष्यवाणी असल में खतरे की ही घंटी है। खाद्य वस्तुओं पर महंगाई 7 फीसदी की रफ्तार से हावी है। धान,दलहन और तिलहन जैसी 65 प्रतिशत जरूरी जिंसों की पैदावार इसी मानसून पर निर्भर करती है। अगर सीजन के दौरान मंडियों में इनकी आवक कमजोर पड़ी तो इससे सिर्फ दामों में उछाल ही नहीं आएगा, सरकार के अनुदान बिल भी बढ़ेंगे। आयात की नौबत आई तो पहले से ही महंगाई से आहत आम आदमी पर तो जैसे आफत ही आ जाएगी। केंद्रीय वित्त मंत्री दादा प्रणव मुखर्जी ठीक ही कहते हैं, घबराने की जरूरत नहीं । सरकार का क्या? आदतन महंगाई का ठीकरा मानसून के सिर फोड़कर सरकार तो किनारे हो जाएगी? लेकिन हकीकत तो यही है कि अगर मौसम का मिजाज बिगड़ा तो हालात संभाले नहीं संभलेंगे। मौसम महकमे के अनुमान कहते हैं,इसका सीधा असर यूपी और पंजाब की उपजाऊ बेल्ट की कमर तोड़ सकता है। वस्तुत: मानसून उम्मीदों का मौसम है। कौन नहीं जानता कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और मानसून उसका प्राण। देश में 65 फीसदी कृषि और 80 प्रतिशत आबादी आज भी मानसून की बारिश पर निर्भर है। महंगाई से निजात का नुस्खा भी यही है। कदाचित यही वजह है कि कृषि और खाद्य सुरक्षा के नाजुक मामले में मानसून पर भारत की अति निर्भरता हमेशा चिंता का विषय रही है। भारतीय खेती अगर आज भी मानसूनी जुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? अब बरसात के चौमासे में मात्र सौ दिन बरसात होती है। सच तो यह है कि सरकारी स्तर पर सिंचाई के क्षेत्र में को निवेश को कभी भी प्रोत्साहित नहीं किया गया है। यह जानने के बाद भी कि बिजली उत्पादन, भूजल रिचार्ज, नदियों का पानी भी मानसून पर निर्भर है, कभी भी बारिश के पानी के प्रबंधन के प्रयास नहीं किए गए हैं। देश में कृषि के लिए आज भी महज 40 फीसदी कमांड क्षेत्र ही उपलब्ध है। मानसून पर अति निर्भरता इस कृषि प्रधान देश की विवशता है लेकिन एक विडंबना यह भी है कि मानसून के पूर्वानुमानों के मामले में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और उसके विज्ञानी भी बहुत ज्यादा भरोसे के काबिल नहीं है। हाल ही के 17 अनुमानों में इनकी सिर्फ 5 भविष्यवाणियां ही सच साबित हुई हैं। चालू मानसून सीजन के लिए इसी मौसम महकमे ने अपने शुरूआती अनुमान में सामान्य बारिश का एलान किया था। दो माह बाद अब कमजोर बरसात का अंदाजा है। मौसम की भारतीय भविष्यवाणियां प्राय: उलटी पड़ जाती हैं। इसके विपरीत अमेरिका और ब्रिटेन में लोग इन्हीं भविष्यवाणियों के भरोसे घर से निकलते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में फिलहाल ऐसा मुमकिन नहीं है। विदेशों में एक या दो क्लाइमेट जोन हैं। वहां पूरे साल मौसम एक सा रहता है। जबकि भारतीय भौगोलिक स्थिति और परिस्थितिकी ऐसी है जो कृषि के लिहाज से देश में कुल 130 क्लाइमेटिक जोन बनाती है। फिर भी सभी जोन में सुपर कंप्यूटर और कलर डॉप्लर राडार लगाकर मौसम विभाग का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। काश, चालू मानसून सीजन के लिए मौसम महकमे का सामान्य से 4 प्रतिशत कम बारिश का पूर्वानुमान एक बार फिर से उलट जाए। बरसात कुछ यूं हो कि खेत हरे हो जाएं और धन-धान्य से भर जाएं खलिहान..

बुधवार, 22 जून 2011

सियासी दांवपेंचों में उलझा लोकपाल



जन लोकपाल के मसौदे के लिए गठित साझा समिति की नौवीं और आखिरी बैठक का सुखांत (सिर्फ सौहार्द पूर्ण बैठक) कैसा भी रहा हो, लेकिन वह भ्रष्टाचार के सवाल पर सिविल सोसायटी को संतुष्ट करने के बजाय सतर्क ज्यादा करता है। अंतत: आम सहमति बनाने में नाकाम रही इस कवायद का सीधा सा अर्थ तो यही है कि यूपीए सरकार व्यापक जनहित से जुड़े इस बेहद नाजुक मामले में सियासी दांवबाजी से बाज नहीं आ रही है। दरअसल, सहमति के रास्ते पर नहीं चलना यूपीए सरकार की राजनैतिक विवशता है। सत्ता,नौकरशाह और इन दोनों के बीच दलालों का त्रिगुटीय गठजोड़ सरकार को जनता के हाथों मजबूत जनलोकपाल देने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होने दे रहा है। मगर बावजूद इसके अगर ऐसे में सरकार की अकड़ एक बार फिर से जरा सी लचर हुई है तो इसका मतलब यह नहीं कि लोकपाल बिल मानसून सत्र में संसद के पटल पर आ ही जाएगा। भारी जन समर्थन और जोरदार दबाव के चलते सरकार यह तो अच्छी तरह से समझ चुकी है कि अब लोकपाल को और ज्यादा लटका पाना मुमकिन नहीं है। जाहिर है,सरकार की चिंता सिर्फ इस बात को लेकर है कि कैसे इस मसले को तकनीकी तौर पर सियासी दावपेंचों में फंसा दिया जाए और यही वजह है कि सरकार आम सहमति के बजाय अलगाव के रास्ते पर है। वह चाहे मसौदे में मौजूद असहमति के मुद्दों को कैबिनेट पर ले जाने का मामला हो या फिर सर्वदलीय सहमति बनाने का मसला । सरकार अपने गुनाहों में सियासी गुनहगारों का संख्या बल बढ़ाकर सिविल सोसायटी को ठेंगा दिखाने की कोशिश में है। देश को यह समझना होगा कि ताकतवर लोकपाल बिल से सत्ता सदैव भयभीत रही है। इस जनतांत्रिक देश में लोकपाल की अवधारणा आधी सदी पुरानी है। वर्ष 1989 से 2001के बीच लोकपाल बिल संसद में चार बार आ चुका है। हैरानी की बात तो यह है कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने से रोकने के लिए आज जिस ज्वाइंट कमेटी के प्रेसीडेंट और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी इतनी हाय तौबा मचा रहे हैं , इन्हीं प्रणव ने इसी लोकपाल के लिए दस साल पहले गठित संसद की स्टैंडिंग कमेटी के प्रेसीडेंट होने के नाते प्रधानमंत्री को लोकपाल की परिधि में लाने की सहमति जताई थी। आशय यह कि लोकपाल के मामले में सरकार बेहद दबाव में है। अभी तक प्रधानमंत्री को हर कीमत पर जनलोकपाल से दूर रखने की जिद पर अडिग रही सरकार ने अप्रकट रूप से सिविल सोसायटी के सामने घुटने टेके हैं लेकिन इस सरकारी तरलता से सहमति का रास्ता साफतौर पर नहीं खुलता है। बाधाएं पग-पग पर हैं। चाहे वह उच्च न्यायालयों, संसद के भीतर सांसदों का आचरण,सीबीआई और सीवीसी को भी जनलोकपाल के दायरे में लाने की मांग हो या फिर लोकपाल की नियुक्ति, पात्रता और उसे पदच्युत करने की प्रक्रिया के यक्ष प्रश्न हों। कहना न होगा कि सरकार सत्ता के अहंकार में भले ही फूल रही हो लेकिन वह इस तथ्य को समझ चुकी है कि जनलोकपाल से जुड़ी जनभावनाओं पर उसकी एक भी भूल अब बहुत भारी पड़ने वाली है। इस मामले में सर्वदलीय भूमिका से कुछ खास की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। जहां तक दलीय सवाल है तो सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं।

सोमवार, 20 जून 2011

सोनिया : एक सच और तीन झूठ





सोनिया माइनो गांधी. भारत की सबसे ताकतवर महिला शासक जिसके प्रत्यक्ष हाथ में सत्ता भले ही न हो लेकिन जो एक सत्ताधारी पार्टी की सर्वेसर्वा हैं. जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी लंबे अरसे से सोनिया गांधी के बारे में ऐसे आश्चर्यजनक बयान देते रहे हैं जिसपर सहसा यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन अब जैसे जैसे समय बीत रहा है सोनिया गांधी का सच और सुब्रमण्यम स्वामी के बयान की दूरियां घटती दिखाई दे रही हैं. सोनिया गांधी के बारे में खुद सुब्रमण्यम स्वामी का यह लेख-

तीन झूठ:

कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं, वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्न में जाहिर की थी। ये पत्न उन्होंने गृह मंत्नालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है, जो उनके जन्म प्रमाण पत्न के अनुसार एकदम सही है।

सोनिया से जुड़ा दूसरा झूठ है उनके पिता का नाम। अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे विश्व युद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपित्त को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं, जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था, सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता।

तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्न में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिविर्सटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटिर्नंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्न में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपित्त के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं, जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है।

सोनिया का भारत में पदार्पण:
सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिविर्सटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिविर्सटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में तब मेरे सामने भी गुस्सा जाहिर किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुङो ब्रेंनेडिस यूनिविर्सटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं , व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्न में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। उन दिनों सोनिया के मित्नों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे बल्कि माधवराव सिंधिया भी थे। सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्नों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं , ये रात दो बजे की बात है , उसी समय आईआईटी का एक छात्न बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्नों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षति भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं, उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा।

सोनिया के केजीबी कनेक्शन:
बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्नी का पुत्न लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्न है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्निलस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट – केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्र ेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भित भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्नी और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्नी पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्नी वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्न पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्नी वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रु सियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है

सोनिया और भारत के कानूनों का हनन:
सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्नोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्न नहीं था जिसे छोड़ा गया। 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्नी श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पिब्लक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्नी हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था) । संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था।

सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव:

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव 197? में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और 197? के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं, जैसा मुहम्मद गौरी, नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्र ेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं।

जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्नी थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्र ेट के क्र ेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान , बहुमूल्य मूर्तियां , शॉल्स, आभूषण , पेंटिंग्स , सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्र ी ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रि स्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा लेकिन उन्हें विश्वास में नहीं ले सका , तब मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी, जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुङो दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एिडशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।

एकदम ताजा मामला 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ा हुआ है। पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रु पए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। प्रधानमंत्नी सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रु पये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्नी ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्नी एम करु णानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है।

(सुब्रमण्यम स्वामी जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं. उनके लेखों और वक्तव्यों से संग्रह करके इसे लेख का स्वरूप दिया है डॉ संतोष राय न: विस्फोट डॉट काम से साभार)

भगवा भूत और शह-मात की सियासत


हिंदू आतंकवाद से जुड़ी सात बहुचर्चित वारदातों की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपने के केंद्रीय गृह मंत्रलय के एलान के साथ ही देश में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। शह-मात के इस सियासी खेल में कानून की भूमिका पर फिलहाल केंद्रीय विधि मंत्रलय विचार कर रहा है। असल में यूपीए सरकार अब एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश में है। एक तो यह कि वह इसी बहाने मध्यप्रदेश और गुजरात की भाजपा सरकारों को कटघरे में लाने की कोशिश कर रही है और दूसरा यह कि इसी आड़ में वह प्रस्तावित सांप्रदायिक एवं निर्देशित हिंसा रोकथाम विधेयक के लिए जमीन बना रही है। सवाल यह है कि आज अगर सहिष्णु भारतीय समाज को भगवा आतंक का भूत भयभीत कर रहा है तो इसके लिए आखिर दोषी कौन है? वस्तुत: हर क्रिया की प्रतिक्रिया स्वभाविक है। चाहे वह मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ हिंदू चरमपंथ हो या फिर हिंदू अतिवाद के विरूद्ध मुस्लिम कठमुल्लापन। आज अगर ये हालात बने हैं तो इसके पीछे वोट के लिए तुष्टीकरण एक बड़ी वजह रही है। यह सच है कि देश में हाल ही में सामने आई कुछ आतंकी गतिविधियों में कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों का हाथ रहा है , लेकिन यह भी सच है कि यह सब सहसा नहीं हुआ है। इसका क्रमिक विकास रजनैतिक मंच पर सरेआम हुआ है मगर बावजूद इसके धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के बाद भी आज अगर इस धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम, खालिस इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा सम्मानित,समृद्ध और सुरक्षित हैं तो यह सब हिंदू जीवन दर्शन में निहित सहिष्णुता ,सह अस्तित्व और सर्वधर्म समभाव का ही परिणाम है। कहना न होगा कि राष्ट्रीय एकीकरण की इस विशिष्टतता में आजादी के आंदोलन से लेकर आजाद भारत के पुनर्निमाण तक भारतीय मुस्लिमों की राष्ट्रीय भावना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है,लेकिन विडबंना देखिए कि स्वार्थ से वशीभूत सियासतदारों ने हमेशा सांप्रदायिक सदभाव को धार्मिक नजरिए से देखने की ऐतिहासिक भूलें की हैं। वर्ना कोई भी समाज समग्र रूप से आतंक का पोषण नहीं कर सकता। यह उसका स्वभाव नहीं। सहअस्तिव समाज का मनोवैज्ञानिक स्वभाव और सामाजिकता उसकी व्यावहारिक विवशता होती है। यदि समाज के किसी भी वर्ग में आतंक का पोषण होता है और वह उसका फौरन प्रतिकार नहीं करता है तो उसे इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है आज अगर दुनिया के तमाम देश मुस्लिम आतंकवाद से दहल रहे हैं तो इसके पीछे समाज की खामोशी एक बड़ा कारण है। इसी खामोशी के मौन समर्थन से आतंकवाद को शक्ति मिली है। अब वक्त आ गया है,जब भारतीय समाज अपनी जिम्मेदारी समङो। ऐतिहासिक भूलों से सबक ले और सियासतदारों को ऐसे अवसर न पैदा करने दे। वोटों के भूखे सियासतदार राजनैतिक रोटियों सेंकने के लिए अक्सर ऐसे अवसर पैदा करने की कुटिल कोशिशें करते हैं। सांप्रदायिकता का सवाल हो या फिर अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक का नाजुक मसला ये ऐसे ही अवसर हैं जो कभी हिंदू तो कभी मुस्लिम आतंकवाद की राह आसान करते हैं। बेशक, वक्त रहते ऐसी साजिशों का सामाजिक शमन जरूरी है और पोषण आत्मघाती।

शनिवार, 18 जून 2011

आर्थिक संकट और अर्थशास्त्रीय सरकार






देश में महंगाई खतरनाक स्तर तक बेकाबू हो चुकी है। भारतीय रिजर्व बैंक की सबसे बड़ी फिर्क यही है कि महंगाई की मार अब अकेले खाद्य वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रही अपितु इसके जहर का असर अब विनिर्मित वस्तुओं तक पहुंच चुका है। आर्थिक लिहाज से यह एक अभूतपूर्व संकट है। इसके विपरीत यूपीए की अर्थशास्त्रीय सरकार की चिंता कुछ और ही है। दरअसल,भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों से घिरी केंद्रीय सत्ता को भी अर्थव्यवस्था पर अपनी राजनीतिक फिसलन का असर दिखने लगा है। विशेषज्ञों की मानें तो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक भी कोना ऐसा नहीं है ,जो राहत देने की उम्मीद बंधाता हो। मसलन-तमाम उपायों के बाद भी महंगाई दर दहाई अंकों पर बनी हुई है। अभी पेट्रोल- डीजल और रसोई गैस के दामों को नियंत्रण मुक्त करने की कवायद प्रस्तावित है। अगर सरकार साहस जुटा पाई तो परिवहन लागत बढ़ने से एक और आफत अंतत: आम आदमी पर ही टूटेगी। चालू माली साल में जीडीपी का ग्रोथ रेट 8 फीसदी से भी नीचे जा सकता है। सकल मुद्रा स्फीति की दर 9 प्रतिशत की रेड लाइन को पार कर चुकी है। औद्योगिक उत्पादन की विकास दर गिरकर महज 6.3 प्रतिशत रह गई है । सवा साल में रिजर्व बैंक की हालिया दसवीं कोशिश से रेपो दर 7.5 और रिवर्स रेपो दर 6.5 फीसदी के स्तर पर भले ही पहुंच गई हो, लेकिन इतना तय है कि अगले चार- छह महीनों में ब्याज दरों में कम से कम दो से तीन बार और चौथाई-चौथाई फीसदी की वृद्धि की आशंका है। बावजूद इसके महंगाई दर 6 फीसदी से नीचे नहीं आने वाली है। एक साल के दौरान होम लोन की दरों में 3 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है। वैसे भी केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा के दौरान इस आशय के साफ संकेत दिए हैं कि मंहगाई को काबू में लाने के लिए आगे भी ऐसे ही सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। मंहगाई के सवाल पर भारतीय रिजर्व का एक ही रटा-रटाया जवाब है। बाजार में नकदी का प्रवाह जरूरत से ज्यादा है ,लिहाजा आवश्यक वस्तुओं की ज्यादा खपत हो रही है। यही महंगाई की मूल वजह है। बाजार में मौजूद नकदी को सोखे बिना संकट से निजात मुमकिन नहीं है। ऐसे में रेपो और रिवर्स रैपो जैसी नैतिक दरों में वृद्धि ही महज एक रास्ता है। असल में सुरसा की तरह मुंह फैला रही मंहगाई पर मुस्के लगाने के मामले में आरबीआई भी अंधेरे में तीर मार रही है। जमीनी हकीकत तो यह है कि हालात अब इस हद तक बेकाबू हैं कि किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है। रिजर्व बैंक के तमाम पूर्वानुमान ध्वस्त हो चुके हैं। अर्थशास्त्रीय सरकार से लेकर उसके सलाहकार और रणनीतिकार चकराए हुए हैं। बकौल आरबीआई अगर महंगाई के लिए बाजार का मौद्रिक उफान दोषी है ,तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? ऋण लेकर घी पीने का चार्वाक दर्शन देने वाली मनमोहन की अर्थशास्त्रीय सरकार आज वैश्विक मंच पर भले ही मजबूत अर्थव्यवस्था का दम दिखा रही हो ,लेकिन घरेलू मामलों के आर्थिक मोर्चे पर वह मुंह दिखाने के लायक नहीं बची है। आज अगर आर्थिक उदारीकरण के दूरगामी दुष्परिणामों की वजह से बाजार में नकदी के बहाव के चलते महंगाई मांग और आपूर्ति के बीच गहरी खाईं बनकर बैठी है,तो गुनहगार कौन है?