शनिवार, 7 मई 2011

बेटियां मांगें जीवन दान


भारत की 15वीं जनगणना के उत्साहजनक आंकड़ें हमारे सामने हैं। बेशक हम जनसंख्या विस्फोट के प्रति अपेक्षाकृत संजीदा हुए हैं। महिलाओं क ी साक्षरता में भी अप्रत्याशित सुधार आया है। मगर सवाल यह है कि हम अपनी मासूम बेटियों के प्रति आखिर कब संवेदनशील होंगे? हम और हमारी सरकारों के लिए इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली कोई और बात क्या होगी कि जनगणना के ताजा आंकड़े गर्भ में ही कन्या कत्ल की गवाही देते हैं। यह अकेले हमारी सरकारी नीतियों की विफलता का नतीजा नहीं है। यह सत्य हमारी, आपकी और हम सब की नीयत से जुड़े नैतिक मूल्यों के क्रियाकर्म का भी दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम है।
मध्यप्रदेश में एक दशक के दौरान जहां प्रति हजार पुरुषों के बीच 11 महिलाएं बढ़ी हैं, वहीं इसी बीच प्रति हजार बालकों के बीच 20 बालिकाएं घटी हैं। यह खतरे की घंटी है। अगर यही आलम रहा तो छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब की तरह मध्यप्रदेश को भी इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। सच तो यह है कि 6 साल से कम उम्र के बच्चों के बीच तेजी के साथ बिगड़ता लैंगिक संतुलन देशव्यापी चुनौती है। आजादी के बाद ऐसा पहली बार है जब बीते एक दशक के दौरान बच्चों का लिंगानुपात बड़ी तेजी के साथ घटा है। देश में वर्ष 1961 में प्रति हजार बालकों के बीच जहां 976 बालिकाएं दर्ज की गई थीं, वहीं आज प्रति हजार बालकों पर बालिकाओं की तादाद घटकर 914 रह गई है।
जनगणना के ताजा आंकड़ों के संदर्भ में हम अपने परिवार कल्याण कार्यक्र मों की सफलता के लिए खुद की पीठ भले ही ठोंक लें, लेकिन कोख में ही कन्या भ्रूण की हत्या का भूत हमारी नैतिकता को झकझोरता जरूर है। मर्म तक मार करते इस मसले पर अब अविलंब एक राष्ट्रव्यापी अभियान के जरिए ईमानदार कोशिश की जरूरत है। यह किसी एक का दायित्व नहीं है। इस आंदोलन के लिए जनजागृति और जन भागीदारी की दरकार है। हमें बेटियों को बचाना ही होगा। कहना न होगा कि आज के खुदगर्ज जमाने में अगर बेटियां जीवंत हैं, तो इसका श्रेय उनकी जिजीविषा और जीवन शक्ति को जाता है।
मध्यप्रदेश के लिए खासकर यह सुखद है कि पिछले एक दशक के दौरान जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में 3.96फीसदी गिरावट आई है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आबादी के लिहाज से ब्रिटेन जैसे देश से भी हमारा प्रदेश आगे है। कमोवेश यही हाल छत्तीसगढ़ का भी है। छग प्रदेश की आबादी आस्ट्रेलिया जैसे देश से भी अधिक है। अगर वाकई हमें हमारी बेलगाम होती आबादी पर लगाम लगानी है, तो जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार पर कम से कम से 10 प्रतिशत की गति से गिरावट लानी होगी। साक्षरता के सवाल पर शानदार प्रदर्शन के बाद भी मध्यप्रदेश के लिए आदिवासी बहुल्य अलीराजपुर और छत्तीसगढ़ का बीजापुर जिला अपने-अपने राज्यों के निरक्षर साबित हुए हैं। निरक्षरता के इस कलंक को मिटाने का भी संकल्प लेना चाहिए।

अमेरिकी थाने में भारत की फरियाद


पाकिस्तान की पनाह में आतंक के आका ओसामा की मौत के बाद अब शक नहीं कि देश की एकता,अखंडता और संम्प्रभुता के दुश्मन हमारा चैन चुरा कर कहीं और नहीं बल्कि पड़ोसी के घर पर ही चैन की बंसी बजा रहे हैं । कहने को तो देश के दुश्मन नंबर वन लश्कर-ए-तैयबा के प्रति भारत का रुख कंट्रोल,ऑल्ट और डिलीट से ज्यादा नहीं है पर असल में हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम और विदेश मंत्री एमएस कृष्णा के इरादे लकीर के फकीर ही हैं। भारत अभी भी चाहता है कि या तो पाकिस्तान स्वयं 26/11 के गुनहगारों को हमारे सुपुर्द कर दे या फिर अमेरिका ओसामा के खिलाफ चलाए गए अपने आतंकवाद विरोधी अभियान को जारी रखते हुए ठीक उसी तरह ढेर कर दे, जैसे ओसामा को मारा गया।
भारत ने एक ओर जहां साफ कर दिया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका जैसी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है वहीं उसका मानना है कि ओसामा के खिलाफ इस आपरेशन से पाकिस्तान की संम्प्रभुता का अतिक्रमण नहीं हुआ है। भारत का यह भी मानना है कि पाक के साथ हमेशा युद्ध की बातें करना तो आसान है, लेकिन पड़ोसी होने के नाते सीधे सैन्य कार्यवाही आखिरी रास्ता नहीं है। भारत की नजर में सिर्फ बातचीत ही एक मात्र विकल्प है पर सवाल यह है कि दशकों से हम समझाइश के जिस अंतहीन रास्ते पर चल रहे हैं, उससे यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हम कभी अपने दुश्मनों के खिलाफ अंजाम तक पहुंच पाएंगे? दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में मस्ती काट रहे भारत के दुश्मनों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट का गुनहगार और 26/11 के हमलों का मददगार दाऊद इब्राहिम करांची के क्लिफ्टन इलाके में ठाठ से रहता है, लेकिन 25 साल बाद भी हम उस पर खरोंच तक नहीं मार पाए हैं। उसके अल-कायदा से रिश्ते हैं और वो लश्कर ए तैयबा के हाथों का खिलौना है। यह अकेला गुनहगार नहीं है। मुंबई हमलों का मास्टर माइंड हाफिज सईद हो या इन्हीं हमलों का दूसरा मास्टर माइंड लखवी कांधार कांड का सूत्रधार मसूद अजहर ,लश्कर-ए-तैयबा का सबसे खतरनाक आका यूसुफ मुजम्मिल या फिर साजिद मीर। सबके सब पाकिस्तान में ही बैठकर भारत विरोधी हिंसक अभियान चलाते हैं।
आशय यह कि हमें मालूम है कि हमारे हमलावर कौन हैं? और कहां उनके ठिकाने हैं? लेकिन विडंबना यह है कि बावजूद इसके आतंक के खिलाफ लड़ाई के लिए आज भी हम दूसरों की मदद के मोहताज हैं। कभी हम पाक से अपने दुश्मनों का समर्पण कराने की गुजारिश करते हैं तो कभी हम अमेरिका से आतंक के खिलाफ जंग जारी रखने की उम्मीद। यह भी साफ है कि अमेरिका हमारी मदद के लिए आने वाला नहीं है। क्या,हमें अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़नी चाहिए?आतंक के खिलाफ आक्रामक रणनीति नहीं अपनाने की हमारी आखिर लाचारी क्या है? आतंक के खिलाफ अमन की हमारी अब तक की कोशिशों के निराशाजनक नतीजे ही हाथ लगे हैं। वक्त का तकाजा तो यही है कि सरहद पार बैठी देश तोड़क ताकतों की कमर तोड़ने के लिए भारत को भी आक्रामक रणनीति अख्तियार कर लेनी चाहिए।

कागजी करारों का अंजाम


्रमध्यप्रदेश में औद्योगिक निवेश की नाकामी के मसले पर कौन किससे परेशान है? सरकार,निवेशकों से या निवेशक सरकार से? राज्य में औद्योगिक विकास की संभावनाओं के साथ शुरू किए गए निवेश के इस अभियान की आज हालत खराब है। तीन साल के दौरान साइन किए गए 16 हजार क रोड़ के 443 एमओयू में से महज 6 प्रतिशत ही मूर्तरूप में हैं। 111 एमओयू सरकार पहले ही निरस्त कर चुकी है। अब नए एमओयू नहीं साइन किए जाने के साथ ,चेतावनी दी गई है कि करार पर काम नहीं हुआ तो शेष एमओयू भी खारिज कर दिए जाएंगे। सरकार के इस फैसले से उद्योग जगत को क्या संदेश जाएगा? क्या ऐसा कोई फैसला बेहतर विकल्प हो सकता है? सरकार को इन तथ्यों की भी समीक्षा करनी चाहिए।
सच तो यह है कि देश के इस बीमारू राज्य में उद्योग के लिए निवेश से ज्यादा अधोसंरचना के विकास में निवेश को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। नई औद्योगिक नीति में सरकार ने इंडस्ट्रीयल इन्फ्र ास्ट्रक्चर के लिए विशेष फं ड के प्रबंध की बड़ी-बड़ी बातें की थीं ,लेकिन आज भी सच तो यह है कि इस मद में ढांचागत विकास के लिए राज्य सरकार सालाना सिर्फ10 करोड़ रुपए ही खर्च कर रही है। जबकि उद्योग जगत इसके लिए हर साल 1 हजार करोड़ के फंड की जरूरत महसूस करता है। लालफीता शाही से निपटने और उद्योगपतियों की समस्याओं के फौरन निदान के लिए वन टू वन फार्मूले की बात आई थी , लेकिन अमल के सवाल पर नतीजा शिफर है। सिंगल विंडो की सुविधा सरकार अभी तक तय नहीं कर पाई है। बिजली,औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरत होती है। इसी इरादे से राज्य में मध्यप्रदेश विद्युत सुधार अधिनियम 2000 लाया गया था। 1991 में मध्यप्रदेश विद्युत मंडल का विभाजन कर विद्युत वितरण कंपनियां बनाई गईं लेकिन यह कवायद भी अंतत: कारगर साबित नहीं हुई। बिजली कंपनियां आज भी हजारों करोड़ के घाटे से उबर नहीं पाई हैं। राज्य में उर्जा क्षति 30 फीसदी से भी ऊपर है। प्रदेश की 11 बिजली उत्पादन ईकाइयां ओवर एज हैं। मांग के मुकाबले राज्य में रोजाना बिजली की आपूर्ति में1100 मेगावाट की कमी है। पीक ऑवर पर यही मांग बढ़कर 1500 मेगावाट पहुंच जाती है।
राज्य में औद्योगिक विकास की एक और बड़ी विडंबना भूखंडों का अभाव है। कहने को तो सरकार के पास 20 हजार का लैंड बैंक है, लेकिन असलियत यह है कि इंदौर के पीथमपुर में स्थित एशिया के सबसे बड़ेऔद्योगिक क्षेत्र, स्पेशल इकॉनामिक जोन (सेज ) में अब जमीन नहीं बची है। भारत के इस ट्रेटायड के विस्तार के लिए सरकार मक्सी और बेटमा में जमीन देने को तैयार है,लेकिन बुनियाद विकास के अभाव में निवेशक जाने को तैयार नहीं हैं। प्रदेश में छोटे-बड़े 35 औद्योगिक क्षेत्र हैं लेकिन वहां भी जमीन नहीं बची है। उद्योग के लिए न्यूनतम 20-25 एकड़ भूखंड की जरूरत होती है, लेकिन जमीन टुकड़ों में उपलब्ध है। यह भी सच है कि प्रदेश की भौगोलिक स्थित औद्योगिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। सरकार के लिए यह संभव नहीं कि वह हर जगह इन जरूरतों को पूरा कर सके। राज्य का रोजानाऔद्योगिक उत्पादन अभी 5 हजार करोड़ का है।

एक और विभाजन की भूमिका


यूपी में विधान सभा चुनाव से थोड़ा सा पहले सक्रिय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी दिग्विजय सिंह ने पृथक बुंदेलखंड प्रांत की बात उठा कर यूपी-एमपी के बीच बारीक विभाजन की एक नई भूमिका तैयार कर दी है। नए और छोटे राज्यों के हिमायती इसे अंतरराज्यीय पुनर्गठन की संज्ञा देकर नई इबारत लिखने का तर्क भी दे सकते हैं। बुंदेलखंड राज्य की मांग कोई नई बात नहीं है। सवाल यह है कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों से मिलकर बने इस निर्धन अंचल की बुनियादी जरूरतें क्या हैं? बांदा में कांग्रेस के प्रिंस राहुल गांधी की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सूखे फूल लेकर मिलने पहुंचे ग्रामीणों ने कहा कि हमें 73 सौ करोड़ का पैकेज नहीं चाहिए। पैकेज तो नेता-अफसर पचा जाते हैं। हम भूखे-प्यासे हैं। हमें दाना-पानी चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या स्वतंत्र राज्य के दज्रे की यह मांग स्थानीय है?या फिर इसका प्रायोजन महज सियासी है।
खनिज-वन संपदा से बेहद निर्धन इस बदनसीब अंचल को यदि हम वाकई नए राज्य का दर्जा दिलाना ही चाहते हैं तो हमें विकास मूलक पैमाने की कसौटी परखना होगा। यह भी देखना होगा कि 1999 में एनडीए सरकार के जमाने में वजूद में आए छत्तीसगढ़,उत्तरांचल और झारखंड जैसे राज्यों में विकास के सवाल पर जमीनी स्तर पर क्या कोई क्रांतिकारी बदलाव आया है? बेशक , छोटे राज्य बुनियादी विकास का आधार होते हैं। देश में जब-तब 18 से भी ज्यादा नए राज्यों के समर्थन में आंदोलन होते रहे हैं । यह भी सच है कि नए राज्यों की मांग के तर्को को खारिज नहीं किया जा सकता है। 121 करोड़ की आबादी वाले 28 राज्यों के इस देश की कुल जनसंख्या विश्व की कुल आबादी का तकरीबन 17 प्रतिशत है। जबकि दुनिया की कुल आबादी के 5 प्रतिशत जनसंख्या वाले अमेरिका में राज्यों की संख्या 60 है, लेकिन नए राज्यों के मामले में हम कितने गंभीर हैं? और हमने राज्य पुनर्गठनआयोग की क्या हालत बना रखी है,यह भी किसी से छिपा नहीं है। नए राज्यों से यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं तो इसका आशय यह कि राज्यों के पुनर्गठन में सिर्फ विकास का मानक हमारा आधार नहीं रहा है। जाति -राजनीति के आधार पर वजूद में आए राज्यों से हम और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। वर्ना, छोटे राज्य के वही पिटे-पिटाए फायदे हाथ लगेंगे। मसलन- जो कभी निगम का चुनाव नहीं जीते उन्हें माननीय बनने का मौका मिल जाएगा। अफसरों को बड़े कैडर की कमाईवाली कुर्सियां मिल जाएंगी। सड़क पर लाल -पीली बत्तियों की बाढ़ आ जाएगी। नई राजधानी वाले शहर की रातोंरात शान बढ़ जाएगी। जमीनों के दाम आसमान चूमने से बिल्डर चांदी काटने लगेंगे। नई-नई योजनाओं के लिए भारी भरकम बजट आते ही सियासतदारों के रिश्तेदार ठेकेदार बन जाएंगे। नई महंगी कारों के शोरूम । होटल-रेस्तरां,पब-बार में रोशन रातों का धंधा दमकने लगेगा। छोटे से राज्य की छोटी सी विधानसभा में कोई निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री बन जाएगा। चंद विधायक जब चाहें सरकार बनाए -बिगाड़ेंगे। जनता के लिए जनता के द्वारा जनता की सरकार के एस नए राज्य में आम आदमी को कुछ नहीं मिलेगा।

वायदा कारोबार की काली करतूत


देश में वायदा कारोबार ने मुनाफे की सारी हदें पार कर दी हैं। पिछले वर्षके मुकाबले चालू माली साल में अब तक 50 फीसदी से भी ज्यादा केकारोबार का अनुमान है। नतीजा यह है कि एक ओर जहां सटोरिएसरेआम चांदी काट रहे हैं। वहीं दूसरी ओर गरीबों का गहना चांदी आमआदमी की पकड़ से उछल कर आसमान पर जा टिकी है। एक साल केअंदर अगर चांदी के दामों में 42 हजार से भी ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गईहै तो इसके पीछे साफ तौर पर वायदा कारोबार ही है और यह कारोबारसट्टेबाजों के नियंत्रण में है।
चांदी को अधिकतम 76 हजार रुपए प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर तकचढ़ाने और आम निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ते ही बिकवाली के जरिएहजार पर भाव गिराने का सटोरियों का खेल सबके सामने है। जाहिरहै कि 11 दिन के अंदर चांदी 17 हजार पर टूट गई। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि चांदी पर जमकर कालाधन लग रहा है और अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब चांदी एक लाख का स्तर पार कर जाएगी। इससेपहले सटोरिए सोने पर भी ऐसा ही दांव आजमा चुके हैं, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि सोने से अब आम निवेशकोंका मोह भंग हो रहा है तो वे सोना छोड़ चांदी को पकड़ कर बैठ गए।
सवाल यह है कि तेजी-मंदी के इस खेल के बाद भी सरकार आखिर सो क्यों रही है? जब सरकार का यह रवैया है तोसटोरियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी वायदा कारोबार की नियामक संस्था वायदा बाजार आयोगएफएमसी)से आखिर उम्मीद भी क्या की जा सकती है? सब कुछ आइने की तरह साफ होने के बाद भी एफएमसीयह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि मूल्यों में उतार-चढ़ाव के लिए अंतत: वायदा कारोबार ही जिम्मेदार हैऔर इस बाजार का नियंत्रण सटोरियों के हाथ में है। इसमें शक नहीं कि चांदी की चमक एक और महाघोटाले केसंकेत दे रही है। असलियत तो यह भी है कि विकसित देशों की तर्ज पर किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्यदिलाने के नेक इरादे के साथ शुरू किए गए वायदा कारोबार का लाभ असल में बड़े व्यापारीनुमा सटोरियों को हीमिल रहा है। सब जानते हैं कि भारत का बाजार अभी वायदा जैसे विकसित कारोबार के लिए तैयार नहीं है।सरकार भी इस जमीनी हकीकत से नावाकिफ नहीं है।
सवाल यह भी है कि सरकार को इस कारोबार पर पाबंदी से परहेज क्यों है? आम उपभोग की जरूरी कमोडिटीज कोवायदा कारोबार से मुक्त रखने के उपभोक्ता मामलों के कार्य समूह की अनदेखी हो या फिर इसी मामले में अभिजीतसेन कमेटी की सिफारिशों को नजरअंदाज कर शकर पर वायदा कारोबार की इजाजत देने का गैर जिम्मेदारानारवैया। सरकार की नीयत साफ नहीं है, लेकिन हकीकत यह है कि बाजार की तमाम तार्किक आर्थिक चिंताओं केबाद भी आवश्यक वस्तुओं को वायदा कारोबार से मुक्त रखने का सरकार का कोई इरादा नहीं है। सरकार के पाससिर्फ एक ही कुतर्क है कि जिंसों के वायदा कारोबार पर रोक से बाजार और दीगर वित्तीय हलकों में गलत संदेशजाएगा। स्पष्ट है कि सरकार की रूचि आम आदमी के बजाय जमा और मुनाफाखोरों को उपकृत करने में ज्यादा है।लिहाजा उपभोक्ताओं के शोषण का यह अंतहीन सिलसिला थमने वाला नहीं है महंगाई से भी राहत मिलने कीउम्मीद नहीं है। आसमान चूमती कीमतों का कृत्रिम संकट वायदा बाजार की काली करतूतों का नतीजा है औरसरकार की भूमिका संदेह के दायरे में है।
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सवालों की सलीब पर बालिका वधू


लाड़ली लक्ष्मी के लिए देश में मशहूर मध्यप्रदेश में आज अक्षय तृतीया के दिन बाल विवाहों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने हर साल की तरह इस बार भी बड़े चाक चौबंद इतंजाम किए हैं। राज्य के कलेक्टरों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी का दर्जा देकर विशेष दल बनाए गए हैं लेकिन अब ऐसी सरकारी सतर्कता चौंकाती नहीं है। चौंकाते तो वो तथ्य हैं, जिनकी बदौलत राज्य में बाल अधिकार कहीं गुम से गए हैं। सवाल यह है कि आखिर सारे सरकारी अभियान अखा तीज के ही दिन क्यों दिखाई पड़ते हैं? तमाम सरकारी और गैर सरकारी सव्रे बताते हैं कि प्रदेश में बाल विवाह के हालात बेकाबू हैं।
बाल विवाह के मामले में देश में मध्यप्रदेश चौथे नंबर पर है। तकरीबन 57.3 प्रतिशत बालिकाओं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। 20 जिले संवेदनशील हैं। मातृ मृत्यु दर का अनुपात प्रति लाख पर 335 है। शिशु मृत्यु दर प्रति हजार पर 70 है। 56फीसदी महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं। 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इन तमाम विडंबनाओं के पीछे कहीं न कहीं बाल विवाह भी जिम्मेदार है। यह तथ्य भी सामने आया है कि प्रदेश में बाल विवाह के कारण 70 से 80 प्रतिशत लड़कियां कम उम्र में मां बन जाती हैं। प्रसव के दौरान ज्यादातर मरने वाली प्रसूताओं की उम्र 15 से 19 साल होती है। हालांकि यह अकेले मध्यप्रदेश का दर्द नहीं है। संकट तो राष्ट्रव्यापी है। यूनिसेफ की मानें तो भारत पूरी दुनिया में सबसे आगे है। विश्व में बाल विवाह की शिकार एक तिहाई महिलाएं अकेले भारत में हैं। देश में 47.4प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 साल के पूर्व हो जाता है। 69 प्रतिशत इस वैवाहिक प्रचलन के साथ देश में बिहार सबसे आगे है।
आंकड़ों की इस बानगी का आशय यह कि बाल विवाह सामाजिक मनोविज्ञान से जुड़ी एक विकट समस्या है। इसकी जड़ें मध्यकालीन मुगलशासन से जुड़ी हुई हैं। देश में हमलावर बनकर इन आक्रांताओं की यह आम धारणा थी कि बालिकाओं से देह संबंध मर्द को शतायु करता है। खुद के लिए पर्दा प्रथा लेकर आए इन विधर्मियों के कारण देश में अस्मिता की रक्षा के लिए घूंघट,सतीप्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों का जन्म हुआ,लेकिनअब भय कैसा? अब तो कानून का राज है मगर ऐसा नहीं है। दबंगों से अपनी बेटियों की इज्जत बचाने के लिए गांव के गरीब आज भी जल्दी से जल्दी बेटियों के हाथ पीले कर देना चाहते हैं। सामाजिक असुरक्षा की भावना इस कदर हावी है कि घर में बेटी के जन्म के साथ ही अभिभावकों को शादी की फिक्र सताने लगती है। ऐसे कि जैसे बेटी इस दुनिया में सिर्फ बच्चे पैदा कर उन्हें पालने पोसने ही आई हो। बेटी पराया धन है। घर में बोझ बन कर बैठी बेटी जितनी जल्दी अपने घर चली जाए अच्छा है, वर्ना जवानी में बहक गई तो समाज को क्या मुंह दिखाएंगे । ऑनर किलिंग जैसे बेहूदा समाज में बेटी के मां- बाप का जीना हराम है।
कहने को तो इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पास बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम जैसे देशी कानून और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार जैसे अंतरराष्ट्रीय करार हैं, लेकिन आंकड़ों की शक्ल में नतीजे हमारे सामने हैं। केंद्र ने 6 साल पहले नेशनल प्लॉन ऑफ एक्शन फॉर चिल्ड्रन के तहत 2010 तक देश से बालविवाह के खात्मे का संकल्प लिया था, लेकिन संकल्प के प्रति आस्था,समर्पण और प्रतिबद्धता की आत्म शक्ति कभी नहीं दिखी। अकेले कानून क्या कर लेगा? सामाजिक भागीदारी बहुत जरूरी है।

सवालों की सलीब पर बालिका वधू