मंगलवार, 23 अगस्त 2011
मध्यप्रदेश में विश्व स्तरीय पर्यटन की संभावनाएं
सिंगापुर के आईलैंड किसको नहीं लुभाते हैं। मध्यप्रदेश के इंदिरागांधी परियोजना क्षेत्र के नैसर्गिक टापुओं में मध्यप्रदेश सरकार, निजी क्षेत्र की भागीदारी से ऐसे ही आईलैंड को विकसित करने के अद्भुत सपने देख रही है। असल में देश में फारेस्ट स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्यप्रदेश को कुदरत ने सौगात में ऐसी प्राकृतिक संपदाएं सौंपी हैं ,जो सचमुच उसे विश्वधरोहर की श्रेणी में रखती है। झीलों और शैलशिखरों से समृद्ध इस प्रदेश का विशाल ग्रामीण फलक टूरिज्म का एक ऐसा जादुई त्रिकोण बनाता है ,जो राज्य के हर संभाग को न केवल पर्यटन का मेगा सर्किट बना सकता है बल्कि उसे देश-विदेश के टूरिज्म सर्किट से जोड़ कर देश के सामने टूरिज्म स्टेट का मॉडल भी पेश कर सकता है। असल में मध्यप्रदेश के 80 प्रतिशत पर्यटन केंद्र ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं। ईको पर्यटन विकास बोर्ड बनाने वाले देश के इस सर्वप्रथम प्रदेश की भौगोलोगिक स्थिति ही कुछ ऐसी है जो ईको और ग्रीन टूरिज्म के साथ-साथ वाइल्ड लाइफ और एडवेंचर टूरिज्म के व्यावसायिक विकास के भी तमाम रास्ते बनाती है। यह अतिशयोक्ति नहीं कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं।
संस्कृतियों का संगम मध्यप्रदेश : देश के दिल मध्यप्रदेश के ग्राम्य जीवन से तमाम ऐसे अनछुए और अव्यावसायिक पर्यटन स्थलों की लंबी फेहरिस्त जुड़ी है जो बरबस रोमांचित करती है। पांच लोक संस्कृतियों के समावेशी संसार मध्यप्रदेश का लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, कला, बोली और परिवेश ही नहीं अपितु जनजातियों की आदिम संस्कृति का विशाल फलक विदेशी सैलानियों को सदैव लुभाता रहा है। विंध्य - सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाएं इसे जहां नैसर्गिक बनाती हैं,वहीं नर्मदा समेत 6 बड़ी नदियों के उद्गम इसे और भी विहंगम बनाते हैं। कालिदास और तानसेन। कला,शिल्प और अद्भुत स्थापत्य। राजतंत्र का वैभवशाली इतिहास। प्रदेश में वैभवपूर्ण पर्यटन को और भी आश्चर्यजनक बनाता है।
भारत का जुरासिक खजाना : मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी क्षेत्र में अनमोल जुरासिक खजाना बिखरा पड़ा है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के धार जिले के 90 हेक्टेयर में 4 करोड़ की शुरूआती लागत से राष्ट्रीय डायनासोर जीवाश्म उद्यान बनाने की सरकारी योजना प्रस्तावित है। भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई) के अध्ययन के अनुसार यहां वर्ष 2007 में डायनोसोर के सौरोपॉड परिवार के 150 से भी ज्यादा अंडो के जीवाश्म की खोज की गई थी। इस इलाके में साढ़े छह करोड़ साल पहले क्रि टेसियस काल 20-30 फुट ऊंचे शाकाहारी डायनासोरों की सल्लतनत हुआ करती थी।
विश्व में भित्तिचित्रों का सबसे बड़ा संग्रह: विंध्य पर्वत श्रृंखला के उत्तरी छोर में स्थित भीमबैठका की पाषाणयुगीन सैकड़ों अद्भुत गुफाएं ,जिसमें आदिमानव द्वारा निर्मित 6 सौ से भी ज्यादा भित्ति चित्रों का यह संग्रह संसार में पाए गए पाषाणकालीन भित्तिचित्रों का सबसे बड़ा संग्रह है। भृतहरि,उदयागिरी और गुप्तगोदावरी की प्राचीन प्राकृतिक गुफाएं कुदरती की पच्चीकारी का अनूठा उपहार हैं। जो विश्वधरोहर का दर्जा हासिल करने की दावेदार हैं।
व्हाइट टाइगर का घर: दरुलभ व्हाइट टाइगर से रूबरू होने का रोमांच आज भी यहीं है। सफेद शेर के घर बांधवगढ़ और टाइगर रिजर्व मोगली सेंच्युरी पेंच जैसे आधा दर्जन से भी ज्यादा सदाबहार नेशनल पार्क भी यहीं हैं। सिगरौली में काले हिरणों का अभयारण्य। सोन और चंबल के घड़ियाल अभ्यारण्य और पन्ना मेंअनमोल हीरे की खदानें देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र हैं। बरगी,तवा और भोपाल की अपरलेक पर क्रू ज वोट की संभावनाएं भी मौजूद हैं। इतना ही नहीं अमरकंटक, मांडू,ओरक्षा,ग्वालियर,चंदेरी, मैहर,चित्रकूट , महाकालेश्वर,ओंकारेश्वर और भोजपुर। प्रदेश में वैभवपूर्ण पर्यटन की फेहरिस्त बड़ी लंबी है।
विश्व की सबसे प्राचीन ईमारत और खजुराहो : सैंड स्टोन से बनी भारत की सबसे प्राचीन ईमारत सांची के स्तूप राजधानी भोपाल से 45 किलोमीटर दूर स्थित हैं। जिन्हें सम्राट अशोक ने स्वयं बारहवीं शताब्दी में बनवाया था। जबलपुर से दूर भेड़ाघाट में नर्मदा किनारे सौ-सौ फीट ऊंची संगमरमर की चट्टानें सैलानियों को अचंभित कर देती हैं। कभी अंग्रेजों की ग्रीष्म कालीन राजधानी रही पहाड़ों की रानी पचमढ़ी प्रदेश का मशहूर हिल स्टेशन है। मैथुन मूर्तियों और स्थापत्य कला के लिए विश्व में मशहूर चंदेल कालीन खजुराहो के मंदिर आज भी पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
इंटरनेशनल एयरपोर्ट: राजधानी भोपाल का राजाभोज एयरपोर्ट अब इंटरनेशनल टर्मिनल से लेस है। भोपाल से दिल्ली-मुंबई समेत देश के 8 शहरों के लिए हवाई सेवा उपलब्ध है। सीधी अंतरराष्ट्रीय उड़ान सेवा हाल ही में उपलब्ध करा दी गई। राजधानी भोपाल के अलावा मिनी मुंबई के नाम से मशहूर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर , संस्कारधानी जबलपुर और विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के साथ-साथ एतिहासिक शहर ग्वालियर भी विमान सेवा से जुड़े हुए हैं।
एयर टैक्सी: सामरिक लिहाज से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रदेश के तमाम बड़े शहरों में बनाई गई हवाई पट्टियों को विकिसत कर इन्हें निकटतम हवाई अड्डों से जोड़ा जा सकता है। राज्य में हवाई सेवा के विस्तार के लिए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने देश के जिन 35 हवाई अड्डों के विस्तार की योजना बनाई है, उनमें प्रदेश के भोपाल,इंदौर, खजुराहो और जबलपुर भी शामिल हैं। भोपाल के नेशनल एयरपोर्ट का विस्तार कार्गो कॉम्लेक्स के रूप में किया जा रहा है।
तेजी से बढ़ रहे हैं सैलानी: मध्यप्रदेश सरकार के पर्यटन विकास निगम के अनुसार प्रदेश के 80 प्रतिशत पर्यटन स्थल ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। जहां पहुंच का संकट नहीं है। ये स्थल या तो रेल मार्गो से जुड़े हैं या फिर राष्ट्रीय और राज्यमार्गो से इन्हें जोड़ा गया है। शहरी पर्यटन के मुकाबले देशी-विदेशी सैलानियों का रूझान ग्रामीण इलाकों में स्थित पर्यटन केंद्रो के प्रति ज्यादा है। मिसाल के तौर पर पिछले साल राज्य के बड़े शहरों के पर्यटक केन्द्रों पर 63 लाख 50 हजार 183 पर्यटक पहुंचे। इनमें से 61 लाख 13 हजार 503 भारतीय तथा 2 लाख 36 हजार 680 विदेशी पर्यटक थे। इसके अलावा इस दौरान धार्मिक स्थलों पर 31 करोड 9 लाख 79 हजार 842 पर्यटक आए। इनमें 31 करोड 9 लाख 66 हजार 92 भारतीय तथा 13 हजार 750 विदेशी पर्यटक शामिल थे । जबकि इसके विपरीत पिछले साल ही ग्रामीण क्षेत्र में स्थित ओरछा में 12 लाख 68 हजार पर्यटक पहुंचे। इनमें 12 लाख 26 हजार भारतीय तथा 42 हजार 300 विदेशी पर्यटक थे। जबकि 7 लाख 60 हजार 683 पर्यटक मांडव पहुंचे। जिनमें 7 लाख 53 हजार 712 भारतीय तथा 6,971 विदेशी पर्यटक थे। इसी समयावधि में एक करोड़ 13 लाख 651 पर्यटक चित्रकूट आए। इनमें एक करोड़ 13 लाख 306 भारतीय तथा 345 विदेशी थे। मैहर में 72 लाख उज्जैन में साढ़े 36 लाख पर्यटक पहुंचे। देश की राजधानी दिल्ली और विश्व के लिए भारत में स्थित सबसे बड़े टूरिज्म प्वाइंट आगरा से हवाई सेवा से जुड़े खजुराहो में रोज 5 सौ के करीब विदेशी और एक हजार से भी ज्यादा देशी पर्यटक पहुंचते हैं।
निजी पूंजी निवेश और जनभागीदारी: हजार संभावनाओं के बाद भी इतना तय है कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन अपार संभावनाओं का व्यावसायिक विकास अकेले मध्यप्रदेश सरकार से संभव नहीं है। सरकार ने इसे लिए अपनी इनवेस्टर समिट स्कीम के तहत निजी पूंजी निवेश की रचनात्मक पहल की है। ग्रामीण पर्यटन स्थलों को राष्ट्रीय और राज्य मार्गो से सीधे जोड़े जाने का काम भी प्रदेश में बड़ी तेजी के साथ चल रहा है। सरकार इन क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्ययोजनाओं पर काम कर रही है। निजी पूंजी निवेश और जनभागीदारी से यदि ऐसा संभव हो पाया तो न केवल मध्यप्रदेश, विश्व के पर्यटन मानचित्र में खुद को स्थापित करने में सफल रहेगा अपितु प्रदेश की कुल श्रमशक्ति में से अकेले 6 प्रतिशत श्रमशक्ति के लिए स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हो जाएंगे। इन अंचलों में रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण श्रमशक्ति के लिए आउटसोर्सिग की भी आवश्यकता नहीं है।
आरक्षण की यूं छा जाना..
लंबे अर्से से सुर्खियों में रही हिंदी फीचर फिल्म आरक्षण अंतत: रूपहले पर्दे पर आकर छा गई। भयावह सियासी आशंकाओं के विपरीत आश्यर्च तो यह है कि न तो कहीं सामाजिक वैमनस्यता की सुगबुगी दिखी और ना ही शांति-व्यवस्था का संकट। अलबता,फस्र्ट डे के फस्र्ट शो ने एक बड़ी विवादास्पद बहस के तमाम भ्रम इंटरवल के पहले ही तोड़ दिए ,लेकिन बावजूद इसके राजधानी भोपाल में बनी इस मुंबइया फिल्म के इर्द-गिर्द अभी भी कई कथानक तेजी के साथ घूम रहे हैं। मसलन- उत्तरप्रदेश,पंजाब और आंध्रप्रदेश में प्रतिबंध के खिलाफ निर्देशक प्रकाश झा सुप्रीमकोर्ट चले गए हैं। अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के मुंबई स्थित प्रतीक्षा और जलसा बंगलों में सुरक्षा सख्त कर दी गई है। मुंबई और मद्रास हाईकोर्ट से बाकायदा हरीझंडी के बाद भी महाराष्ट्र में छगन भुजबल की महात्मा फुले समता परिषद फिल्म का प्रदर्शन नहीं होने देने की धमकियां दे रही है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने फिल्म के कुछ सीन्स और डायलॉग पर अपनी आपत्ति से सेंसर बोर्ड को अवगत करा कराकर उन्हें हटाने की अड़ी डाल दी है। आशय यह कि आरक्षण की पृष्ठभूमि से शिक्षा के व्यावसायीकरण को फोकस करती यह सामाजिक-राजनैतिक फिल्म अब थियेटर के बाहर अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के दमन का पर्याय हो गईहै। सामाजिक सरोकार से जुड़े तमाम संजीदा संदेश पर्दे के पीछे अंधेरे में हैं। राजनैतिक निहितार्थ साफ तौर पर सामने हैं। फिल्म के विवादित संवादों को बीप और दृश्यों को संपादित करने के बाद भी विरोध के तेवर अंतत: इन तथ्यों की पुष्टि करते हैं कि आरक्षण की आड़ में सियासत सिर्फ अपनी रोटियां सेंक रही है। मध्यप्रदेश समेत देश के दीगर राज्यों में आरक्षण की सुपरहिट कामयाबी इन आरोपों को और भी तल्ख करती है कि झगड़े की जड़ फिल्म की आरक्षण केंद्रित कथावस्तु और प्रस्तुति नहीं अपितु समाज के सियासी ठेकेदार ही हैं। जो अपने नफे-नुकसान के लिए न केवल सामाजिक समरसता में विष घोलते हैं बल्कि शांति व्यवस्था के खतरों का खौफ दिखाकर मनमानी भी करते हैं। आरक्षण के खिलाफ यूपी और पंजाब जैसे उत्तरभारत के जिन दो राज्यों ने सबसे ज्यादा सक्रियता दिखाई वहां अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। यूपी में दलितों की कथित हमदर्द मायावती की सरकार है। सोशल इंजीनियरिंग की दम पर एक मर्तबा फिर से सत्ता के सपने देख रहीं माया हरगिज नहीं चाहती कि ऐसे नाजुक मौके पर बोतलबंद आरक्षण का जिन्न बाहर आए। सच तो यह भी है कि केंद्रीय अनसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पन्नालाल पुनिया को भी आरक्षण फिल्म से कोई खास लेना-देना नहीं है। पुनिया की परेशानी भी कुछ और ही है। सेवानिवृत्त आईएएस अफसर पीएल पुनिया कभी यूपी की बसपा सरकार में मुख्यमंत्री मायावती के सचिव हुआ करते थे। अब वह पाला बदल कर न केवल कांग्रेस के सांसद हैं अपितु माया से उनकी खांटी अदावत के चलते वह केंद्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष के रूप से सत्ता सुख भोग रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति मामलों में प्राय: माया सरकार को घेरने में माहिर पुनिया इससे पहले कि इसका सियासी लाभ लेने की कोशिश करते सतर्क मायावती सरकार ने आनन-फानन में आरक्षण पर उत्तरप्रदेश चल चित्र (विनियमन) 1955 की आड़ लेकर पुनिया को किनारे लगा दिया। आरक्षण फिल्म के खिलाफ पूरे देश में कमोबेश यही सियासी सच है।
गुरुवार, 11 अगस्त 2011
फेसबुक पर फर्जी हाईप्रोफाइल
सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की फर्जी प्रोफाइल के मामले में एमपी पुलिस अभी किसी ठोस नतीजे पर पहुंची भी नहीं थी कि यू टय़ूब में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विवादास्पद वीडियो ने पुलिस की नींद उड़ा दी। सीएम के नाम पर प्रदेश में साइबर क्राइम का यह पहला मामला है। साइबर सेल के आईजी राजेंद्र कुमार कहते हैं,जांच जारी है,लेकिन सवाल यह है कि अंतत: अंजाम क्या होगा? सच तो यह है कि साइबर क्राइम के केस कोर्ट में साबित करना तो दूर अपराधी को ट्रेस कर पाना तक संभव नहीं है। साइबर क्राइम कितना सुरक्षित है, इस बात का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब पुलिस ने फेसबुक मुख्यालय से जानकारी चाही तो निजता भंग होने की कानून आड़े आ गया। हार कर पुलिस को इंटरपोल की मदद लेनी पड़ी और तब कहीं इंदौर के वो दो नाबालिग छात्र पकड़ में आए जिन्होंने ये शरारत की थी। सवाल यह भी है कि अगर यह सीएम से सीधे जुड़ा हाईप्रोफाइल मामला नहीं होता तो क्या फेसबुक के इस फर्जी प्रोफाइल मामले में मध्यप्रदेश पुलिस इंटरपोल तक जाती? कहने को तो साइबर सेल भी सक्रिय है लेकिन सच यह है कि राज्य के इंदौर,उज्जैन और रतलाम में साइबर क्राइम के खिलाफ मॉडल सिटी का प्रस्ताव फाइलों में ही फंस कर रह गया है। नेशनल साइबर सिक्योरिटी एलायंस इंडिया(एनसीएसए)ने देश के 6 राज्यों के 17 शहरों को इसके लिए चिन्हित किया था ,जहां साइबर अपराध के खिलाफ पुलिस को न केवल प्रशिक्षित किया जाना था बल्कि ऐसे अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराए जाने थे जो अपराधों का विश्लेषण कर सकें। आमतौर पर साइबर क्रिमिनल इतने सतर्क और दक्ष होते हैं कि पलक झपकते ही क्राइम के फुट-फ्रिंगर प्रिंट मिटा देते हैं ,जबकि इसके मुकाबले ना तो पुलिस में इतनी विशेषज्ञता है और नाही वह तकनीकी तौर पर मजबूत है। ऐसे में अपराधी कब-किसकी ऑनलाइन इज्जत उतार दें, कुछ कहा नहीं जा सकता है? यह अकेले मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे देश की विडंबना है। सिमेंटेक को आशंका है कि देश के लगभग 76 प्रतिशत इंटरनेट उपभोक्ता किसी न किसी रूप में साइबर क्राइम के शिकार हैं। यह अपराध सालाना 50 प्रतिशत की गति से बढ़ रहा है। तीन साल में 9 हजार भारतीय वेबसाइट हैक हो चुकी हैं। अमेरिकन की सुरक्षा एजेंसी एफबीआई का भी मानना है कि दुनिया में भारत साइबर क्राइम का पांचावा सबसे बड़े शिकार है। देश के लिए हैकिंग के खतरे कितने संवेदनशील हैं अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल दिसंबर में चीनी हैकर्स ने अति सुरक्षित माने जाने वाले पीएमओ कार्यालय के कंप्यूटर हैक कर लिए । देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, कैबिनेट सचिव, और प्रधानमंत्री के विशेष दूत के निजी कंप्यूटरों तक में सेंधमारी हुई। मई 2008 चीनी हैकरों ने विदेश मंत्रलय की वेबसाइट हैक कर ली थी। 1998 में देश में पाकिस्तान की ओर से पहला साइबर अटैक पोखरण में परमाणु परीक्षण के दौरान हुआ था जब हैकर्स ने भारतीय मीडिया की वेबसाइट्स हैक कर ली थी। 1999 में आर्मी की साइट के अलावा 2001 में संसद अटैक और 26/11 में मुंबई हमले के दौरान भी सरहद पार बैठे हैकर्स ने ऐसे ही हमले किए थे। नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (नैसकॉम)और सीबीआई की साइबर सेल की साझा कोशिशों के बाद भी भारतीय डॉटा सुरक्षा परिषद (डीएससीआई)लाचार है। देश अपनी डॉटा प्रणाली तक सुरक्षित नहीं है। यहां गौर तलब तथ्य यह भी है कि बतौर इंटरनेट यूजर भारत पूरी दुनिया में चौथे नंबर पर है। ऑरकुट में विश्व में इसका दूसरा स्थान है। देश में सोशल नेटवर्किग साइट्स के 250 लाख यूजर हैं। दो साल पहले यही तादाद महज 30 लाख थी। 90 प्रतिशत यूजर 16 से 40 साल के हैं। विश्व के कुल14 करोड़ फेसबुक यूजर्स में से अकेले पौने 2 करोड़ भारतीय हैं। एक अनुमान के अनुसार दुनिया के कुल फेसबुक यूजर्स में से1 करोड़ फर्जी हैं। जालसाजों की यह जमात कब गुल खिला दे कुछ कहा नहीं जा सकता है?
बुधवार, 10 अगस्त 2011
कृषि कैबिनेट:नीति और नीयत
खेती को लाभ का सौदा बनाने को बेताब राज्यसरकार ने कृषि कैबिनेट को अंतत: हरी झंडी दे दी है। अब मध्यप्रदेश समूचे देश में ऐसा पहला राज्य होगा जहां ऐसे रचनात्मक नवाचार के तहत कृषि बजट के लिए पृथक से प्रावधान होगा। यह सच है कि असली अर्थो में कृषि मध्यप्रदेश के जीवन का आधार है। राज्य की तीन चौथाई से भी ज्यादा आबादी कृषि या फिर इससे जुड़े कारोबार पर ही निर्भर है, लेकिन यह भी असत्य नहीं कि राज्य में प्राकृतिक संसाधनों और कृषि क्षेत्र की तमाम संभावनाओं के बाद भी कभी इसका समुचित इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन बावजूद इसके अगर सरकारी दावों पर यकीन करें तो मौजूदा समय में प्रदेश के सकल राज्य घरेलू उत्पादन में कृषि का अंशदान 22.47 प्रतिशत है। ऐसे में तमाम प्राकृतिक विपदाओं के बीच राज्य की 7.53 फीसदी कृ षि विकास दर भी नई उम्मीदें जगाती है। यह उपलब्धि तब और भी अहम हो जाती है , जब राष्ट्रीय कृषि औसत विकास दर में सिर्फ .04 प्रतिशत वृद्धि ही दर्ज की गई हो। सरकार इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानती है। खुशफहमी का आलम तो यह है कि वह कृषि विकास के कथित ठोस आधारों की दम पर मध्यप्रदेश में कृषि विकास दर के कभी भी नकारात्मक नहीं होने का दावा भी करती है। विगत खेती सीजन में सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश के बाद भी अप्रत्याशित विकास दर का नतीजा यह है कि केन्द्रीय योजना आयोग भी मध्यप्रदेश में दो गुना से भी अधिक वृद्धि को कृषि विकास की दृष्टि से फास्ट ट्रेक का दर्जा दे चुका है। अति उत्साहित सरकार अब कृषि विकास दर में 10 प्रतिशत की वृद्धि का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। सवाल यह है कि क्या किसानों को कृषि कैबिनेट की सौगात देने वाली सरकार वास्तव में खाद्यान्न उत्पादन को ही प्रोत्साहित करना चाह रही है। या फिर वह अपने बेहतर कृषि आधारों को सिर्फ खुले बाजार के लिए तैयार कर रही है? शक इस तथ्य पर भी स्वाभाविक है कि कृषि कैबिनेट की कवायद कहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लुभाने की महज ब्रांडिंग भर तो नहीं है? सरकारें जिस तरह से आर्थिक उदारवाद की नीतियों को नीतिगत रूप से स्वीकार कर चुकी है। ऐसे में यह आशंका नाहक नहीं कही जा सकती है। सरकारी तौर पर अब तक खाद्यान्न उत्पादन की बजाय सोयाबीन, जेट्रोपा और कपास जैसी नकदी फसलों के उत्पादन का प्रोत्साहन हो या फिर फल-सब्जियों की अनुबंधित खेती। ऐसी ही आशंकाओं की पुष्टि करते हैं। कृषि क्षेत्र के प्रति तेजी के साथ निजी कंपनियों का बढ़ता रूझान भी किसी से छिपा नहीं है। नई कृषि नीति के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब बाजार की मांग के मुताबिक किसानों से फसलों का उत्पादन करा सकेंगी। मसलन-आलू सिर्फ सब्जी के लिए नहीं चिप्स के लिए भी पैदा किया जाएगा। इससे सरकार और बाजार को तो बहुत कुछ मिलेगा,लेकिन किसान को क्या मिलेगा? ऐसे में संभव है उसे एक ऐसा बाजारू वातावरण मिले जहां उसकी हैसियत उत्पादक नहीं अपितु उपभोक्ता जैसी ही हो। ऐसे में हमें यह भी सोचना होगा कि धन का बहाव बढ़ाने की कोशिश में कहीं हमारी खाद्य सुरक्षा किसी गंभीर संकट में न फंस जाए। वैश्विक आर्थिक मंदी के इस विकट दौर में घरेलू अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए बाजारीकरण से परहेज नहीं ,लेकिन इसकी भी सीमाएं होनी ही चाहिए। नीयत साफ होनी चाहिए।
मंगलवार, 9 अगस्त 2011
आरक्षण पर अब सियासी सेंसर
यदि आपके पास सिर्फ दो ही विकल्प हों तो आप क्या करेंगे? इलाज के लिए उच्चवर्ग के उस डॉक्टर के पास जाएंगे ,जिसने डोनेशन देकर मेडिकल में दाखिल लिया था या फिर ऐसे डॉक्टर के पास जिसने आरक्षित कोटे से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की है? शायद दोनों के पास नहीं। तो फिर क्या आप बगैर इलाज के मर्ज से ही मर जाना चाहेंगे..असल में देश में आरक्षण की राजनीति ने इस नाजुक मसले को कुछ यूं ही अनुत्तरित कर दिया है । न्याय और नैतिकता का तकाजा तो यह है कि आरक्षण के सवाल पर शर्मसार करती सियासत के लिए चुल्लूभर पानी ही काफी है। बेशक,आरक्षण एक संवैधानिक सत्य है और प्रजातांत्रिक व्यवस्था में इसका पालन एक कानूनी बाध्यता है,लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि आरक्षण के पैरोकार कभी यह जानने की कोशिश क्यों नहीं करते कि इस संवैधानिक व्यवस्था के अब तक के नतीजे क्या रहे हैं? क्या वाजिबों को वाकई उनका हक मिल रहा है? या फिर आरक्षण की आड़ में अकेले क्रीमीलेयर ही मलाई मार रहे हैं? यह जाने बगैर कि सच क्या है,आरक्षण का नाम आते ही राजनीति के सामाजिक ठेकेदार उग्रता की हद तक आंदोलित हो जाते हैं। आज अगर आरक्षण का नाम ही आग का पर्याय है तो दोषी कौन है? प्रदर्शन को तैयार हिंदी फीचर फिल्म आरक्षण को लेकर कमोबेश पूरे उत्तर भारत में उठे बवाल के पीछे आखिर कौन लोग हैं? मध्यभारत के इसी भोपाल शहर में बनी इस मुंबइया फिल्म का मध्यप्रदेश में भले ही बेसब्री से इंतजार चल रहा हो मगर, अगर यूपी में पिछड़ों के पैरोकार विरोध कर रहे हैं ,तो राजस्थान में अगड़े भी पीछे नहीं हैं। मुंबई हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है तो बिहार में अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के खिलाफ मुकदमा कायम हो चुका है। और तो और बगैर फिल्म दिखाए प्रदर्शन की अनुमति देने पर राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड(सीबीएफसी) की अध्यक्ष लीला सेमसन पर लालपीले हो रहे हैं। सब जानते हैं कि सेंसर बोर्ड भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय के अधीन एक ऐसा विनियामक आयोग है, जो भारत में फिल्मों, टीवी धारावाहिकों,टीवी विज्ञापनों और विभिन्न प्रसारण सामाग्री की समीक्षा कर अतिवाद को नियंत्रित करता है। आमतौर पर चार सदस्यीय सेंसर बोर्ड किसी भी फिल्म को हरी झंडी देने के लिए काफी होता है लेकिन आरक्षण का 9 सदस्य इंतजार कर रहे थे। जिसमें आरक्षण से लाभान्वित समुदाय विशेष के प्रतिनिधि, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक पूर्व जज भी शामिल थे। सेंसर बोर्ड ने बगैर कैंची चलाए फिल्म जाने दी हंगामा शुरू हो गया। विरोध के आधार क्या हैं? किसी को कुछ भी नहीं मालूम। अकेले प्रोमो झगड़े की जड़ है। इसमें शक नहीं कि उत्तेजक प्रोमो का उदे्श्य बॉक्स ऑफिस में फिल्म को सुपर हिट करना है। जहां तक सवाल आरक्षण के निर्देशक प्रकाश झा का है तो उनकी फिल्मों से विवाद का गहरा नाता रहा है। दामुल,मृत्युदंड,गंगाजल,राजनीति और अब आरक्षण उनकी फिल्मों की कथा वस्तु ही कुछ ऐसी होती है जो राजनीतिक-सामाजिक सच को कुरेदने के कारण प्रदर्शन से पहले तूफान जरूर लाती है। आरक्षण को लेकर उठी आग के पीछे अगर फिल्म प्रोमटरों की मार्केटिंग को भी देखें तो 90 के दशक में वीपी सिंह सरकार के पतन का कारण रहा यह वही आरक्षण है जिसके सियासीकरण ने उसे सरेबाजार नीलाम कर दिया है।
ग्रामीण बाजार प्रबंधन में पंचायतों की भूमिका
असली भारत गांवों में रहता है। कृषि आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है,लेकिन अन्नदाता किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। गांवों के परंपरागत कुटीर उद्योगों के खात्मे के बाद गांवों की हाट बाजार व्यवस्था भी लगभग टूट चुकी है। किसान (उत्पादक)और उपभोक्ता के बीच बिचौलियों(दलालों)का एक बड़ा नेटवर्क सक्रि य है ,जो मात्र माध्यम होने के कारण मनमानी मुनाफा कमाता है। जबकि किसानों का वाजिब मूल्य तो दूर प्राय: लागत मूल्य तक नहीं मिल पाता है। दलालों के कारण वस्तु का दाम बढ़ने से इसका असर उपभोक्ता पर पड़ता है। जिसका लाभ सीधे बड़े व्यापारियों को मिलता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि आत्म निर्भर ग्रामीण बाजार
के अभाव के कारण जहां असली उत्पादक किसान भुखमरी का शिकार है। वहीं उपभोक्ता को सस्ती वस्तुओं के मनमानी दाम चुकाने पड़ रहे हैं और लाभ बड़े व्यापारी और दलाल कमा रहे हैं। आत्मनिर्भर ग्रामीण बाजार नहीं होने के कारण भ्रष्ट सरकारी तंत्र भी किसानों और ग्रामीण व्यापारियों का आर्थिक और मानसिक शोषण करता है।
1-हाट-बाजार :
ग्रामीण भारत की हाट की प्राचीन बाजार व्यवस्था की फिर से स्थापना ही एक मात्र रास्ता है। ताकि उत्पादक अपनी वस्तु को सीधे उपभोक्ता तक ले जाए। इससे उपभोक्ता को जहां वाजिब दाम पर वस्तु मिलेगी वहीं उत्पादक को भी उसका उचित दाम मिल सकेगा। वस्तु की गुणवत्ता की गारंटी भी सुनिश्चित हो जाएगी। निकटतम शहरों के साप्ताहिक बाजारों में पहुंच को और भी आसान किए जाने के उपाय भी इस मामले में अत्यंत लाभकारी साबित हो सकते हैं।
2- पंचायतीराज व्यवस्था:
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था वास्तव में ग्रामीण बाजार के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। गांवो का विकास मूलत: पंचायतीराज व्यवस्था पर ही निर्भर है। लेकिन सत्ता के विकेंद्रीकरण की यह व्यवस्था अभी सिर्फ ग्रामीण विकास के आधारभूत ढांचे को विकसित करने पर ही केंद्रित है। महात्मागांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)की तर्ज पर पंचायतीराज व्यवस्था के तहत ग्रामीण बाजार के विकास और उसके प्रबंधन को प्राथमिकता में लेकर हमारी केंद्र और राज्य सरकारें देश में जमीनी स्तर पर आर्थिक सुधारीकरण का मॉडल पेश कर सकती हैं।
3-जनभागीदारी और सरकारी सहयोग:
इसमें ज्यादा से ज्यादा जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकारें समाजसेवी संगठनों और आमजन का सहयोग ले सकती हैं। इसके लिए कानून बना कर सरकार ग्राम पंचायत स्तर पर एक ऐसी एकल खिड़की खोल सकती है, जिसमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग,कृषि,कृषि विस्तार,उद्योग,वाणिज्य एवं व्यापार विभाग और पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग जैसे संबंधित विभागों को एक छत के नीचे लाकर ग्रामीण बाजार प्रबंधन को फलीभूत किया जा सकता है।
4-कार्ययोजना:
ग्रामीण बाजार प्रबंधन में पंचायती राज व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसमें ग्रामीणों किसानों,गरीबों खासकर अनुसूचित जाति,अनुसूचित जन जाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं की आत्म निर्भरता के लिए भी पृथक से कार्ययोजनाएं बनाई जा सकती हैं। प्रबंधन की प्रक्रिया को भी विस्तार से रेखांकित किया जा सकता है।
5- संदर्भ:
ग्रामीण बाजार के विकास और उसके प्रबंधन में पंचायती राज की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग,पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग,कृषि एवं विस्तार विभाग और वाणिज्य एवं व्यापार विभाग की विभिन्न कल्याणकारी विकास योजनाओं का भी अनुभवों को भी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ)के क्रियाकलापों का भी समग्र रूप से अध्ययन किया जा सकता है।
6- निष्कर्ष :
निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था के केंद्र ग्रामीण भारत में बाजार व्यवस्था का प्रबंधन और विकास वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह गरीबी निर्मूलन में भी अहम रोल अदा कर सकती है। अब तक के अनुभव बताते हैं कि पंचायतीराज व्यवस्था इसके लिए अत्यंत आसान और कारगर मददगार साबित हो सकती है।
के अभाव के कारण जहां असली उत्पादक किसान भुखमरी का शिकार है। वहीं उपभोक्ता को सस्ती वस्तुओं के मनमानी दाम चुकाने पड़ रहे हैं और लाभ बड़े व्यापारी और दलाल कमा रहे हैं। आत्मनिर्भर ग्रामीण बाजार नहीं होने के कारण भ्रष्ट सरकारी तंत्र भी किसानों और ग्रामीण व्यापारियों का आर्थिक और मानसिक शोषण करता है।
1-हाट-बाजार :
ग्रामीण भारत की हाट की प्राचीन बाजार व्यवस्था की फिर से स्थापना ही एक मात्र रास्ता है। ताकि उत्पादक अपनी वस्तु को सीधे उपभोक्ता तक ले जाए। इससे उपभोक्ता को जहां वाजिब दाम पर वस्तु मिलेगी वहीं उत्पादक को भी उसका उचित दाम मिल सकेगा। वस्तु की गुणवत्ता की गारंटी भी सुनिश्चित हो जाएगी। निकटतम शहरों के साप्ताहिक बाजारों में पहुंच को और भी आसान किए जाने के उपाय भी इस मामले में अत्यंत लाभकारी साबित हो सकते हैं।
2- पंचायतीराज व्यवस्था:
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था वास्तव में ग्रामीण बाजार के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। गांवो का विकास मूलत: पंचायतीराज व्यवस्था पर ही निर्भर है। लेकिन सत्ता के विकेंद्रीकरण की यह व्यवस्था अभी सिर्फ ग्रामीण विकास के आधारभूत ढांचे को विकसित करने पर ही केंद्रित है। महात्मागांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)की तर्ज पर पंचायतीराज व्यवस्था के तहत ग्रामीण बाजार के विकास और उसके प्रबंधन को प्राथमिकता में लेकर हमारी केंद्र और राज्य सरकारें देश में जमीनी स्तर पर आर्थिक सुधारीकरण का मॉडल पेश कर सकती हैं।
3-जनभागीदारी और सरकारी सहयोग:
इसमें ज्यादा से ज्यादा जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकारें समाजसेवी संगठनों और आमजन का सहयोग ले सकती हैं। इसके लिए कानून बना कर सरकार ग्राम पंचायत स्तर पर एक ऐसी एकल खिड़की खोल सकती है, जिसमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग,कृषि,कृषि विस्तार,उद्योग,वाणिज्य एवं व्यापार विभाग और पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग जैसे संबंधित विभागों को एक छत के नीचे लाकर ग्रामीण बाजार प्रबंधन को फलीभूत किया जा सकता है।
4-कार्ययोजना:
ग्रामीण बाजार प्रबंधन में पंचायती राज व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसमें ग्रामीणों किसानों,गरीबों खासकर अनुसूचित जाति,अनुसूचित जन जाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं की आत्म निर्भरता के लिए भी पृथक से कार्ययोजनाएं बनाई जा सकती हैं। प्रबंधन की प्रक्रिया को भी विस्तार से रेखांकित किया जा सकता है।
5- संदर्भ:
ग्रामीण बाजार के विकास और उसके प्रबंधन में पंचायती राज की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग,पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग,कृषि एवं विस्तार विभाग और वाणिज्य एवं व्यापार विभाग की विभिन्न कल्याणकारी विकास योजनाओं का भी अनुभवों को भी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ)के क्रियाकलापों का भी समग्र रूप से अध्ययन किया जा सकता है।
6- निष्कर्ष :
निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था के केंद्र ग्रामीण भारत में बाजार व्यवस्था का प्रबंधन और विकास वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह गरीबी निर्मूलन में भी अहम रोल अदा कर सकती है। अब तक के अनुभव बताते हैं कि पंचायतीराज व्यवस्था इसके लिए अत्यंत आसान और कारगर मददगार साबित हो सकती है।
सभ्य संसदीय आचरण का संकट
15 वीं लोकसभा के आठवें सत्र का दूसरा दिन भी अंतत: हंगामे की भेंट चढ़ गया। सब जानते हैं कि संसद का यह सत्र देश में व्यापक जनहित के लिए कितना महत्वपूर्ण है। देश महंगाई,भ्रष्टाचार, आतंकवाद,और अांतरिक सुरक्षा जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है । संसद पर भी निरंतर काम का बोझ बढ़ रहा है। 83 विधेयक पहले से प्रस्तावित हैं। 35 नए विधेयक कतार में हैं। लेकिन सियासी खेमे सिर्फ स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और शक्तिसंपन्न साबित करने पर तुले हुए हैं। सत्ता हो या विपक्ष सवाल यह है कि आखिर सभ्य संसदीय आचरण क्या है? संसद का शांतिपूर्ण संचालन या फिर यूं ही आरोप-प्रत्यारोप और हंगामा। संसद के मानसून सत्र से पूर्व लोक सभाध्यक्ष अध्यक्ष द्वारा सर्वदलीय बैठक के आयोजन की संवैधानिक परंपरा का अर्थ ही यही है कि विधायी कार्य प्रभावित नहीं होने पाएं लेकिन इस कयावद के फौरन बाद बजरिए बयानबाजी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस तरह से एलान-ए-जंग कर दिया उससे साफ जाहिर है कि सरकार स्वयं सदन के शांतिपूर्ण संचालन के प्रति गंभीर नहीं है। इससे पहले संसद का शीतकालीन सत्र जिस टेलीकॉम घोटाले की भेंट चढ़ गया था आज वही स्कैंप अब और भी ताकतवर हो गया है। अब तो स्वयं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी आरोपों की आंच से जल रहे हैं। संसद के विधायी कार्यो को बाधित होने से बचाना वस्तुत: सरकार की जिम्मेदारी होती है और सरकार इस दायित्व का निर्वाह सिर्फ तभी कर सकती है जब वह विपक्ष के मुद्दों को नजरअंदाज न करे मगर विडंबना यह है कि विपक्ष का ऐसा कोई भी मुद्दा नहीं है सरकार जिसका आंखों से आंखे मिलाकर मुकाबला कर सके। कालाधन समेत जनहित से जुड़े तमाम अहम मामलों में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख, कमजोर जनलोकपाल पर अण्णा हजारे की अड़ी, तीन अति चर्चित घोटालों पर कैग की रिपोर्ट और यूपीए के आगे एकजुट विपक्ष के साथ थोड़ा कम भ्रष्ट एनडीए के मोर्चाबंदी से केंद्र सरकार बैकफुट पर है। मतदान नियम के जरिए सदन में चर्चा से बच रही सरकार यह भी जानती है कि उसके पास सच कहने के लिए कुछ भी नहीं है। भाजपा किसी भी हालत में मैनेज होने को तैयार नहीं लगती है। अंदरखाने का सच तो यह है कि संसद के अंदर कांग्रेस के नेतृत्ववाली गठबंधन सरकार सरकार में से सिर्फ कांग्रेस ही बची है। यूपीए के दीगर सहयोगी दल उसके साथ खड़े नजर नहीं आते हैं। ममता बैनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से कांग्रेस और तृणमूल में जिस तरह से फासले बढ़े हैं वह किसी से छिपे नहीं हैं। तृणमूल ने पश्चिमी बंगाल के लिए विशेष पैकेज की मांग को लेकर केंद्र पर दबाव बनाने का फरमान जारी कर जहां कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं,वहीं कनिमोझी की रिहाई पर ही डीएमके भी कांग्रेस से दिल मिलने की शर्त रख चुकी है। एक और अहम सहयोगी दल एनसीपी के मौकापरस्त शरद पवार कब,क्या गुल खिला दें कुछ कहा नहीं जा सकता है? ऐसे मौकों पर कांग्रेस की संकट मोचक सपा-बसपा भी यूपी में आसन्न विधानसभा चुनावों के मद्ेनजर कांग्रेस से दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझ रही हैं। सच तो यह है कि सत्ता में सहयोगी तीन सांसदों के जेल जाने और तेलंगाना मसले पर कांग्रेस के एक दर्जन सांसदों के इस्तीफे के बाद भी यूपीए सरकार सिर्फ संख्या बल की दम पर जीवित है। वह अपना नैतिक बल खो चुकी है। लोकपाल के सवाल पर सर्वदलीय एकजुटता भले ही हो लेकिन महिला आरक्षण एक ऐसा मसला है जो विपक्ष की एकजुटता को बिखेर सकता है लेकिन सरकार जानती है कि सिर्फ इतना काफी नहीं है। शायद शोर-शराबा और संसदीय कार्य में बाधा ही टाइम पास का सबसे अच्छा रास्ता है।
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Rohit Mishra
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