मंगलवार, 9 अगस्त 2011

कर्नाटक से कुछ तो सीखो

16 हजार 85 करोड़ के खनन घोटाले पर लोकायुक्त द्वारा राज्यपाल से मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश के बाद बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक की कुर्सी में बने रहने का अधिकार खो चुके थे। ऐसे में भाजपा के पास भी उनसे इस्तीफा लेकर लीडरशिप बदलने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं था,लेकिन राजनीति की तासीर ही कुछ इतनी बेशर्म है कि येदियुरप्पा दादागिरी दिखाना नहीं भूले। अब वह लोकायुक्त की रिपोर्ट को कानूनी चुनौती देने की तैयारी में हैं। देश के लिए यह पहला मौका है, जब लोकायुक्त ने किसी राज्य के मुख्यमंत्री को सीधे भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया है। संभवत: देश में अकेले कर्नाटक ही इकलौता ऐसा राज्य होगा जहां लोकायुक्त नख-दंत विहीन कागजी शेर नहीं है। लोकायुक्त संतोष हेगड़े की 26 हजार पन्नों की रिपोर्ट बताती है कि अकेले मुख्यमंत्री ही नहीं 4 मंत्रियों के साथ तकरीबन 6 सौ से भी ज्यादा अधिकारियों के ताकतवर नेटवर्क ने 3 साल के अंदर किस तरह से करोड़ों की संपदा लूटी। किस तरह से सौ से अधिक कंपनियां देश की बहुमूल्य संपदा को चोरी-छिपे सीधे चीन पहुंचा रही थीं। 4 लाख फाइलों और 50 लाख प्रविष्टियों की जांच से तैयार यह रिपोर्ट इस तथ्य का भी खुलासा करती है कि सियासी हमाम में आखिर सब कैसे नंगे होते हैं? क्या भाजपा और क्या कांग्रेस? खनन घोटाले में भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को 30 करोड़ का लाभ पहुंचाने वाली साउथ वेस्ट माइनिंग कंपनी कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल के भाई सज्जन जिंदल की है और जिंदल परिवार के साथ कांग्रेस की यारी किसी से छिपी नहीं है। सज्जन के पिता ओपी जिंदल हरियाणा में कांग्रेस के मंत्री हुआ करते थे और मां सवित्री मौजूदा समय में भी हरियाणा सरकार में मंत्री हैं। येदियुरप्पा के इस्तीफे और उनके उत्तराधिकारी की तलाश की कवायद के बाद यह मानना जल्दबाजी ही होगी कि कर्नाटक का संकट अब समाप्त हो चुका है। असल में दक्षिण भारत में भाजपा की पहली और इस इकलौती सरकार के सामने अब असली संकट मुख्यमंत्री की एक अदद कुर्सी के लिए सामने आए आधा दर्जन से भी ज्यादा दावेदारों में से किसी एक को चुनने का है। सवाल यह है कि भाजपा के लिए कर्नाटक महत्वपूर्ण है या येदियुरप्पा का राजनीतिक वजूद? बेशक,कर्नाटक में भाजपा की सत्ता पार्टी के लिए नए युग की शुरूआत थी और इसमें भी शक नहीं कि भाजपा के लिए दक्षिण भारत में मार्ग प्रशस्त करने वाले कोई और नहीं यही येदियुरप्पा ही थे। शायद यही वजह है कि पार्टी हाईकमान नए मुख्यमंत्री के चयन के मामले में मुख्यमंत्री कम और येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी चुनने की रणनीति पर ज्यादा काम कर रही है। वैसे इस मामले में मूल पेंच भाजपा हाईकमान के भीतर ही है। पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी येदियुरप्पा से जबरन इस्तीफा लेने के पक्ष में नहीं थे वह स्वयं येदियुरप्पा के इस्तीफा देने के पक्ष में थे लेकिन पार्टी बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज ने इसे नाक का सवाल बना लिया। कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े के करीबी माने जाने वाले आडवाणी असल में येद्दी की जगह अनंत कुमार की ताजपोशी भी चाहते हैं। लेकिन येदियुरप्पा अब ऐसा होने देंगे। आसार नहीं हैं। बेशक,कर्नाटक में भाजपा की अपनी मजबूरियां हैं। विधानसभा में उसका बहुमत मामूली है। येदियुरप्पा बगावत करते तो सत्ता हाथ से जाती। कर्नाटक में दो साल बाद चुनाव हैं। सिर पर मानसून सत्र सवार है लेकिन इतना तय है कि भ्रष्टाचार पर मानसून सत्र में कांग्रेस पर दबाव बनाने की खुशफहमी पाल कर बैठी भाजपा की कर्नाटक के संकट ने हवा निकाल दी है।
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स्टॅलवॉक : यही पैगाम हमारा..



टोरंटों से सीधे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और फिर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचा स्टॅलवॉक अब देश के दूसरे बड़े शहरों की ओर रूख करने की तैयारी में है। ऐसी में इसके औचित्य पर बहस का छिड़ना भी लाजिमी है, लेकिन महिलाओं की इस मोर्चाबंदी पर बहस के केंद्र से बुनियाद मुद्दे गायब हैं। सवाल अकेले मॉड,मिनी और माइक्रो ड्रेस पर आकर टिक गए हैं। यानि यौन हमलों के लिए उत्तेजक पोषाक आखिर कितनी जिम्मेदार है? स्टॅलवॉक के समर्थकों और विरोधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के इस सिलसिले में एक पक्ष अपने तमाम तर्को से जहां खुले लिबास को दोषी ठहरा रहा है, वहीं दूसरा पक्ष खुले लिबास के मुकाबले इसके लिए तंग सामाजिक नजरिए को दोषी मान रहा है। सच तो यह भी है कि बेशर्मी मोर्चा रातोंरात यूं ही मशहूर नहीं हो गया है। इसकी पहचान के केंद्र में वही दृष्टिदोष है जिसने नारीवादियों के वास्तविक संदेश को नेपथ्य में डालकर यह उत्सुकता जगा दी कि आखिर भारतीय महिलाओं का अश्लील प्र्दशन कैसा होगा? टोरंटों,लंदन और अमेरिका में स्टॅलवॉक के नग्न प्र्दशनों से पैदा हुई जिज्ञासा तब हवा हो गई जब बेशर्मी मोर्चे की शक्ल में पहले एशियाई शहर भोपाल पहुंचे स्टॅलवॉक मे शामिल आधा सैकड़ा से भी ज्यादा समर्थक उत्तेजक नहीं अपितु आकर्षक परिधानों में सड़क पर आए। अंग प्रदर्शन की आस लगाकर बैठे मीडिया को ऐसा ही झटका राजधानी दिल्ली में भी लगा। वस्तुत: वस्तुस्थिति तो यह भी है कि शुरूआती दौर में बेशर्मी मोर्चे के आयोजक स्वयं अपने सामाजिक सरोकार का साफतौर पर सामने रखने में नाकाम रहे लिहाजा सवाल ऐसे उठे कि आयोजकों को बार-बार सफाई देनी पड़ी और आलोचकों को मुह बिचकाने का मौका मिला। सच पीछे ही रह गया और यौनिक हमलों के लिए माइक्रो ड्रेस फोकस पर हो गई। यह एक वजह हो भी सकती है और नहीं भी लेकिन औरत की अस्मिता से जुड़े इस गंभीर विषय को समग्र रूप से देखने की जरूरत है। पूरा देश हो या देश का दिल मध्यप्रदेश महिलाओं की हालत ठीक नहीं है। महिलाओं के मामले में भारत देश का चौथा सबसे खतरनाक देश है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड वूमेन के मुताबिक 30 फीसदी महिलाएं अपने ही जीवन साथी के हाथों शारीरिक और मानसिक हिंसा की शिकार हैं । 10 प्रतिशत महिलाएं तो ऐसी हैं जो गंभीर किस्म की यौन प्रताड़ना का दर्द भुगत रही हैं। सीबीआई की एक आंशका के अनुसार देश में सालाना 30 लाख लड़कियों की वैश्यावृत्ति के लिए तस्करी होती है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि 5साल के अंदर देश में वैश्याओं की तादाद बढ़ कर दो गुनी हो गई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक बलात्कार की वारदातों में मध्यप्रदेश देश में सबसे आगे है। देश में होने वाली इस किस्म की वारदातों में अकेले 16 प्रतिशत हिस्सेदारी मध्यप्रदेश की होती है। ऐसे में यहां बेशर्मी मोर्चे जैसे अभियानों को जमीन मिलना भी स्वाभाविक भी है। महिलाओं के हक और सम्मान के खिलाफ जंग के इस एलान में केंद्र में क्या होना चाहिए। पितृसत्तात्मक बहुरूपिया समाज सत्य है जहां शर्म तो स्त्रियों का आभूषण है लेकिन बेशर्मी भी पुरूषों का स्थाई चारित्र। महिला हिंसा । भेदभाव। घरेलू हिंसा। कामकाजी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न।देहज प्रताड़ना और दहेज हत्या। शारीरिक यातना के अलावा ऐसी मानसिक मार जिसके जख्म जिस्म पर तो नहीं दिखते लेकिन कलेजे पर जाकर पैबस्त हो जाते हैं। ऐसी मार जो सीधे मर्म पर मार करती है। जिसका कोई कानूनी दावा । सजा और हर्जाने की शक्ल में भरपाई नहीं है। घुट-घुट कर जीने की लाचारी है। यह कम सुखद नहीं कि एक एक अच्छी शुरूआत है प्रारूप भारतीय संस्कृति और संदर्भो पर ही केंद्रित रहना चाहिए। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि यह अभियान अकेले एलीट वर्ग की आवाज बन कर न रह जाए। देश को भोपाल का यही संदेश है।

मगर,नहीं मानेगी महंगाई



कोई कितने ही जतन क्यों न कर ले महंगाई हार मानने वाली नहीं है। महंगाई नियंत्रण पर भारतीय रिजर्व बैंक के कठोर मौद्रिक उपाय हों या फिर सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता। पूरी दुनिया में हावी खराब आर्थिक हालात और आने वाले दिन भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। जाहिर है,इसके असर से भला भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अछूती कैसे रह सकती है? ऐसे में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का यह पूर्वानुमान हरगिज गले नहीं उतरता कि साल के अंत तक अंतत: महंगाई काबू में आ जाएगी। देश के ताजा आर्थिक हालात पर यह रिपोर्ट तब आई है,जब आम आदमी की जान पर बन आई महंगाई के सवाल पर संसद के मानसून सत्र में शोलों की बरसात हो रही है। पेट्रोल की तरह रसोई गैस, डीजल और केरोसिन को भी नियंत्रण मुक्त कर एक मर्तबा फिर से दाम बढ़ाने की कोशिशों में जुटी केंद्र सरकार के आर्थिक सलाहकार अगर 4 माह के अंदर महंगाई दर गिराकर 6.5 कर लेने का दावा करते हैं तो वह सिर्फ भ्रम के आंकड़े परोस रहे हैं। सच तो यह है कि बेदम आर्थिक नीतियों के चलते बेलगाम हुई महंगाई को काबू में लाने के लिए सरकार और आरबीआई को अब न तो कोई उपाय सूझ रहा है और न ही उसके आर्थिक सलाहकारों को ही कुछ समझ में आ रहा है। ऐसे में इतना साफ है कि कठोर मौद्रिक उपाय जारी रहने से ऊंची ब्याज दरों को यूं ही भुगतना होगा और आम उपभोग की जरूरी खाद्य वस्तुओं के लिए आगे अभी और भी ज्यादा कीमतें चुकानी होंगी। संभव है मानसून सत्र से फुर्सत होते ही सरकार रसोई गैस, डीजल और केरोसिन को नियंत्रण मुक्त करने का फैसला लेकर मूल्य निर्धारण बाजार के हवाले कर दे। यदि ऐसा हुआ तो देश की एक बड़ी आबादी के सामने दो जून की रोटी का एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। वैश्विक स्तर पर यह एक सिर्फ सरकारी खुशफहमी हो सकती है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों में अभूतपूर्व आर्थिक तंगी के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की 8.2 फीसदी की रफ्तार बेहतर है। असल में इस कागजी आंकड़े का आमआदमी की मुश्किलों से कोई वास्ता नहीं है। यहां एक सत्य यह भी है कि सस्ते पेट्रो पदार्थो की सहज उपलब्धता के मामले में हम एक खामोश खतरे की ओर तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। आज नहीं तो कल अमेरिकी दबाव के चलते भारत के साथ ईरान के तेल सौदे का दुखांत तय है। सऊदी अरब के बाद ईरान ऐसा दूसरा बड़ा देश है, जो भारत को कच्चे तेल की कुल जरूरत का 12 प्रतिशत आयात करता है। लेकिन अमेरिकी इशारे पर भारत ने ईरान के खिलाफ न केवल आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं बल्कि 7 माह से तेल खरीदी के मद में5 अरब डॉलर का भुगतान भी प्रतिबंधित कर दिया है। ईरान के खिलाफ भारत असल में अमेरिका के साथ इतना आगे बढ़ चुका है, जहां से ईरान की ओर लौटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। अमेरिका के प्रति भारत का यह पिछलग्गूपन आज नहीं तो कल भारत में गंभीर पेट्रो संकट का खामोश खतरा है। क्योंकि तब कच्चे तेल पर भारत की पूरी निर्भरता अरब देशों पर स्थिर हो जाएगी। आर्थिक मोर्चे पर भारत की यह कूटनीतिक विफलता बहुत मंहगी पड़नेवाली है।
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मां होने का मतलब..

दुनिया इन दिनों विश्व शिशु स्तनपान सप्ताह मना रही है। मध्यप्रदेश में भी सरकारी तौर पर इसका शोरशराबा है। सवाल यह है कि ऐसे सरकारी और कागजी आयोजनों की जमीनी हकीकत क्या है? सिवाय इसके कि सात दिन बैनर-पर्चे,पोस्टर और बहुत हुआ तो होर्डिग या फिर इक्का-दुक्का विचार गोष्ठियों की रस्म अदायगी के साथ बात जैसे कैलेंडर में एक तारीख की तरह आई थी वैसे ही चली जाएगी। जनजागृति और जनभागीदारी की बड़ी-बड़ी बातों के बीच ऐसी फिजूलखर्चीऔर इसी बहाने बजट के बंदरबाट से बेहतर यह नहीं कि समस्या की जड़ में जाकर समाधान को समझा जाए। सब जानते हैं कि मध्यप्रदेश में महिला स्वास्थ्य सुधार एक बड़ी चुनौती है। स्वस्थ्य जननी से ही स्वस्थ्य संतान की उम्मीद की जा सकती है,लेकिन उम्मीद के एकदम विपरीत हकीकत हिला देती है। राज्य में 56 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं। मां तो मां प्रदेश के 74.1प्रतिशत बच्चे भी एनमिक हैं। इनमें से लगभग 60 फीसदी से भी ज्यादा बच्चे तो गंभीर रूप से कुपोषित हैं। प्रति लाख पर मातृमत्यु दर का औसत अगर 379 है, तो शिशु मृत्युदर का यही औसत अनुमान 97 के इर्द-गिर्द बैठता है। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलीजेंस की मानें तो मध्यप्रदेश में रोज 371नवजात और 35 प्रसूताओं की मौत होती है। इस मामले में चालू साल के लिए राज्य सरकार ने प्रतिलाख पर मातृमत्यु दर घटाकर 220 और शिशुमृत्यु दर गिराकर 62 किए जाने का लक्ष्य रखा था। ऐसे जादुई आंकड़े का लक्ष्य कैसे मुमकिन है यह तो राज्य शासन के स्वास्थ्य सलाहकार ही बता पाएंगे, लेकिन निर्धारित लक्ष्यावधि के सिर्फ 4 ही महीने बचे हैं। अलबत्ता, 82 प्रतिशत संस्थागत प्रसव के सरकारी दावे के बीच महज15 प्रतिशत बच्चों को ही जन्म के एक घंटे बाद मां का दूध नसीब हो पाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी नवजात के लिए प्रसूता मां का पहले एक घंटे का दूध सचमुच अमृत के समान होता है। कुदरती तौर पर ऐसा दुग्धपान बच्चे में ताउम्र स्वस्थ्य जीवन की बुनियाद रखता है, लेकिन आखिर ऐसा संभव क्यों नहीं है? अध्ययन बताते हैं कि प्रदेश की प्रसूताओं में खून की कमी एक कॉमन डिजीज सी हो गई है। जच्चा-बच्चा के लिए जानलेवा यह चुनौती उन तमाम कारणों में से एक है ,जो सीजेरियन डिलेवरी के लिए मजबूर कर देती है। पैसे के लिए सामान्य प्रसव का ऑपरेशन या फिर प्रसव पूर्व इलाज की आड़ में सामान्य प्रसव को सीजेरियन के लिए मजबूर कर देने के चिकित्सकों के गोरखधंधे के अलावा प्रसूताओं के लिए खानपान से जुड़ी तमाम भ्रांतियों का नतीजा यह है कि सामान्य प्रसव अब गुजरे जमाने की बातें हो गई हैं। अध्ययन यह भी बताता है कि सीजेरियन डिलेवरी से जन्में शिशु को एक घंटे के अंदर दुग्धपान संभव नहीं है। जन्म के बाद सबसे पहले नवजात को पुराने कपड़े पहनाने,शहद चटाने और प्रसूता को दो-चार दिन तक संतुलित आहार से दूर रखने जैसे सामाजिक रीति- रिवाज भी समझ से परे हैं। विडंबना तो यह है कि बगैर किसी वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार के ऐसी परंपरागत मान्यताओं को प्रदेश में एक बड़ा जनाधार है। आशय यह कि स्वास्थ्य सेवाओं के परिवार कल्याण कार्यक्रमों से जुड़े सरकारी तंत्र और सामाजिक क्षेत्र को जमीनी स्तर पर सक्रिय इन तमाम समस्याओं के समाधान पर फोकस होना चाहिए।

प्रदेश सरकार का परदेशी मोह


मध्यप्रदेश के आम बजट का प्रारूप अंतरराष्ट्रीय वित्त सलाहकार संस्था प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स(पीडब्ल्यूसी)से बनवाने के राज्य शासन के फैसले पर अर्थशास्त्रियों की आपत्ति वाजिब लगती है। यह सरकारी फैसला तब और गंभीर हो जाता है, जब राजकीय अर्थव्यवस्था से जुड़े नाजुक मामले में नीतियों के निर्धारण का जिम्मा पीडब्ल्यूसी जैसी ऐसी विदेशी संस्था को सौंपे जाने की बात चलती है,जिस पर हैदराबाद के ग्लोबल ट्रस्ट बैंक जैसी गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के चलते भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले से ही उस पर पाबंदी लगा रखी हो। प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स की लेखा परीक्षा सेवाएं लेने पर प्रतिबंध का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। सवाल यह है कि क्या मध्यप्रदेश सरकार के वित्तीय सलाहकार इतना भी नहीं जानते कि सूचना प्रौद्यागिकी के क्षेत्र में अब तक भारत की चार बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनियों में शुमार रही सत्यम कंप्यूटर कंपनी के बहुचर्चित 8 हजार करोड़ के घोटाले में पीडब्ल्यूसी की भूमिका किस कदर संदिग्ध रही है? सत्यम कंपनी के खातों में हेराफेरी की सहभागीदारी रही पीडब्ल्यूसी वही अंतरराष्ट्रीय वित्त सलाहकार संस्था है, जिसके खिलाफ मुंबई की स्माल इन्वेस्टर ग्रीवांसेज एसोसिएशन ने शेयर मार्केट की नियामक संस्था सेवी से स्थाई प्रतिबंध की मांग की थी। केतन पारेख शेयर मामले और डीएसक्यू सॉफ्टवेयर घोटाले को लेकर पीडब्ल्यूसी के खिलाफ इसकी भारत में स्थित परसंपत्तियां जप्त करने की मांग जब-तब उठती रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक हो चुकी यह कंपनी अब पूरी दुनिया में बदनामी की ओर है। दो साल पहले ही ब्रिटेन में व्यवसाय को वियनियमित करने वाली संस्था लेखा एवं बीमांकिक अनुशासन बोर्ड पशुधन लेखांकन में अनियमितिता पर इसके सब प्राइम लेंडरों के खिलाफ जांच बैठा चुकी है। जापान स्थित इसकी सहयोगी कंपनी छाओओयामा पर भी पहले से ही ऐसी ही पाबंदी है। यूं तो दुनिया की सबसे बड़ी प्रोफेशनल कंपनियों में शुमार पीडब्ल्यूसी विश्व की चार बड़ी लेखा फर्मो में भी एक है लेकिन इसका आशय यह तो नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मानकों पर स्थानीय कर,मूल्य निर्धारण, लेनदेन ,व्यापक रिकवरी , कारपोरेट, वित्त, व्यापार, मूल्यांकन और लेखा सुधार के सेवा क्षेत्र में अग्रणी इस कंपनी पर बजट मैनुअल जैसे अहम मसले के लिए यूं ही आंख बंद करके यकीन कर लिया जाए? आरोप है कि राज्य शासन के पास पीडब्ल्यूसी के तकबरीबन दो सौ करोड़ के अनुदान भी हैं। इन आरोपों में कितना दम है यह तो जांच का विषय है? मगर इतना तय है कि कोई भी विदेशी कंपनी अनुदान देकर हमारी राजकीय वित्तीय नीतियों के निर्धारण का अधिकार आखिर कैसे हासिल कर सकती है? ऐसे में पीडब्ल्यूसी जैसी बदनामशुदा और दागदार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सलाहकार कंपनियों की सलाह पर बजट प्रारूप का निर्माण किंचित मात्र भी उचित नहीं है। दुनिया में ऐसे साफ सुथरे वित्तीय सलाहकारों और प्रबंधकों की कमी नहीं है जो राज्य शासन की इस कमी को पूरा न कर सकें। जहां तक राज्य सरकार का सवाल है तो मध्यप्रदेश की आवश्यक नीतियों के निर्धारण में विदेशी मोह कोई नई बात नहीं है। सब जानते हैं कि मध्यप्रदेश सरकार की अपनी कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है। स्वास्थ्य नीति के नाम पर डेनमार्क की एक कंपनी डेनिडा का 9 साल पुराना एक ड्रॉफ्ट है,जो प्रदेश में खराब स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकार के बजाय नागरिकों को दोषी मानता है और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की वकालत करता है। गनीमत है राज्य शासन की दवा नीति विदेशी प्रारूप पर निर्भर नहीं है लेकिन एक सच यह भी है कि प्रदेश में दवाओं का दर निर्धारण जहां तमिलनाडु मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन करता है,वहीं सरकारी दवाओं की खरीदी के लिए दवा उत्पादक कंपनियों के नाम चैन्नई की आईएमएनएससी सुझाती है।

राजधानी भोपाल में मेट्रो रेल के सपने

क्या राजधानी भोपाल को वास्तव में मेट्रो रेल की जरूरत है? क्या यहां इसकी संभावनाएं मौजूद हैं? आखिर कैसे साकार होगा मेट्रोरेल का सपना? अंतत: इन उत्सुकता भरे तमाम सवालों को गिराते हुए मेट्रो मैन और दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन लिमिटेड(डीएमआरसी) के एमडी डॉ.ई श्रीधरन ने साफ कर दिया कि यह राज्य शासन का सही समय पर लिया गया दूरदर्शी निर्णय है। वास्तव में डीएमआरसी के फीजिबिलिटी सव्रे ने भोपाल में मेट्रो रेल के सपने को साकार करने की बुनियाद रख दी है। राजधानी भोपाल की तरह प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर को भी ग्रीन सिगनल मिलना भी सुखद है। इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि राज्य के भोपाल,इंदौर,ग्वालियर और जबलपुर जैसे महानगरों समेत कोई भी नगर, नियोजन के पैमाने की कसौटी पर खरा नहीं है। जरा सी बरसात में राजधानी का अनियंत्रित यातायात बताता है कि नगरीय निकाय अब तक जल निकासी जैसे जरूरी प्रबंध तक नहीं कर पाया है। इंदौर हो या भोपाल दोनों महानगरों में जहां तेजी के साथ आबादी का दबाव बढ़ रहा है, वहीं इनके विस्तार में भी तेजी आई है। दोनों की शहरी बसाहट भी कुछ ऐसी है कि अब यातायात को नियंत्रित और व्यवस्थित कर पाना संभव नहीं है। बायपास और नो पार्किग जोन जैसे वैकल्पिक उपाय भी अब अल्पकालिक हो चुके हैं। यह कहना अनुचित नहीं कि इसके विपरीत राज्य के महानगरीय अधोसंरचना विकास,आवासीय प्रबंध और नगरीय यातायात के विकास के लिए किसी दीर्घकालिक योजना पर कभी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया गया है। नतीजा यह है कि अभी भी राजधानी में मेट्रो रेल परियोजना की सबसे बड़ी तकनीकी और व्यावहारिक बाधा सिटी मोबेलिटी प्लान और कंप्रेहेन्सिव ट्रांसपोर्ट प्लान का अभाव है। ये वो कार्ययोजना है जो मेट्रो रेल से संबंधित मार्गो,मानकों और जरूरतों के निर्धारण में मददगार साबित होती। अब ये वहीं बाधाएं हैं जो आज नहीं तो कल डीपीआर(डीटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करने के दौरान डीएमआरसी के सामने मुश्किलें खड़ी करेंगी। कहना न होगा कि राज्य में नगरीय विकास के लिए अब तक व्यवहारिक निर्णय नहीं लिए जानें की ऐसी ही भूलों के मद्देनजर मेट्रो ट्रेन परियोजना भूल सुधार का एक अहम उपाय कही जा सकती है। बेहतर पार्किग प्रबंधन,सुगम माल परिवहन और तेज रफ्तार सड़क यातायात के बीच सुरक्षित सफर के लिए भूमिगत मेट्रो रेल सर्विस वास्तव में न केवल वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है अपितु समय पर लिया गया एक दूरदर्शी फैसला भी है। इस सुविधा से पर्यावरण के भी अपने अनगिनत फायदे हैं। राज्य के सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले इंदौर-भोपाल को आबादी के दबाव से बचाने के लिए शासन स्तर पर छोटे नगरों में रोजगार मूलक अधोसंरचना के विकास की भी कारगर रणनीति बनानी होगी। बेहतर हो यह रणनीति कम से कम 20 वर्षीय पूर्वानुमानों के आकलन पर केंद्रित हो। मध्यप्रदेश में 20.3 प्रतिशत की गति से बढ़ रही जनसंख्या दर के दौरान राज्य के इंदौर-भोपाल जैसे शहरों में आबादी का 32.7 फीसदी की दर से बढ़ना एक बड़े खतरे की ही घंटी है।

मुख्यमंत्री का प्रशासनिक प्रबंधन

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दूसरे कार्यकाल की तीसरी कमिश्नर-कलेक्टर कांफ्रेंस सरसरी तौर पर गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रही है। प्रशासनिक कसावट और प्रशासनिक सजर्री के परंपरागत उपायों के एकदम इतर प्रशासनिक प्रबंधन की रचनात्मकता से साफ है कि सरकार को अफसरशाही पर भरोसा तो है लेकिन अब वह सिर्फ अफसरों के भरोसे नहीं है। सीधे संवाद और समन्वय के बीच मुख्यमंत्री ने अपनी अपेक्षाएं और इरादे जिस कुशलता से स्पष्ट किए हैं, इससे नौकरशाही का यह मिथक भी तकरीबन टूट चुका होगा कि शिवराज अब अनाड़ी नहीं रहे। अब वह संभवत:सरकार बना भी सकते हैं और यकीनन चला भी सकते हैं। शिव सरकार के शुरूआती कार्यकाल में यह आम धारणा बनी थी कि उनमें प्रशासनिक पकड़ की कुशलता नहीं है ,लेकिन मिशन-2013 के आसन्न सियासी घमासान के मद्देनजर मुख्यमंत्री की बारीक प्रशासनिक बुनावट बताती है कि अकेले विकास की बुनियाद पर खड़ी सरकार की बेदाग छवि ही बेड़ा पार लगा सकती है। शायद यही वजह है कि शिवराज मैदानी इलाकों में प्रशासनिक अफसरों की एक ऐसी यंग टीम खड़ी करना चाहते हैं जो नित नई रचनात्मक सोच, ताजा उमंग और उर्जा के साथ लक्ष्य भेदने की कूबत रखती हो। वह ऐसी ही एक और अनुभवी टीम वल्लभ भवन ,सतपुड़ा और विंध्यांचल में भी चाहते हैं। प्रशासनिक सुधारों की इस कवायद से पहले मंत्रियों,प्रमुख सचिवों और सचिवों के साथ चली साझा मैराथन बैठकों के सिलसिले को इन्हीं अर्थो में समझा जा सकता है। समय-समय पर माननीयों के साथ नौकरशाहों के तल्ख होते रिश्तों पर तालमेल की पहल रही हो या जब-तब पार्टी गाइड लाइन की पटरी छोड़ते मंत्रियों को नसीहत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बेहतर प्रबंधन की ही रणनीति अपनाते रहे हैं। बेशक, दो दिन तक चली कमिश्नर-कमिश्नर कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री का रचनात्मक प्रबंधन काबिले गौर रहा। उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रशासनिक अफसरों को पुरुस्कृत करने का प्रहसन रहा हो या फिर दंडित करने की दो टूक चेतावनी। या फिर दिन में इन दोनों विकल्पों के बीच प्रशासनिक अधिकारियों के बीच परस्पर प्रतिस्पर्धापूर्ण अवसर खड़े करने की रणनीति रही हो और रात में सीएम हाउस में इन्हीं अफसरों को डिनर देकर दिल जीत लेने वाली मेजबानी। कहीं सपाट तो कहीं सांकेतिक अर्थो में मुख्यमंत्री यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि वह सरकारी योजनाओं का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के पक्ष में हैं। अफसर सिर्फ शो पीस नहीं हैं और अगर वह ऐसा करते हैं तो यह प्रदेश की 7 करोड़ आबादी के साथ अन्याय दंडनीय अपराध है। एन वक्त पर डिंडौरी कलेक्टर का विकेट चटका कर सीएम ने यह भी साबित कर दिया है कि देर नहीं लगेगी। लापरवाही नहीं चलेगी। चलेगा वही जो खुद को साबित करेगा। एक समय इसी सरकार की खासी किरकिरी करा चुके चंद नौकरशाह अब बंद एसी चेंबरों में ऊंघते नहीं हैं अलबत्ता पसीने में तरबतर फाइलों के ढेर में मिलते हैं। असल में अब सबके रिपोर्ट कार्ड सीएम के हाथ में हैं। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मौजूदा प्रशासनिक प्रबंधन किस हद तक सरकार की सार्वजनिक छवि को सुधार पाता है? यह देखना वास्तव में बेहद दिलचस्प होगा। मगर इतना तय है कि आगाज तो अच्छा है,अंजाम खुदा जाने..

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